तमिलनाडु मंत्रिमंडल में दो नौसिखिए मंत्री - किसके रिश्तेदार?


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तमिलनाडु में डीएमके (DMK) सरकार ने हाल ही में जो कैबिनेट फेरबदल किया, उसकी गूँज राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ज़्यादा सुनाई नहीं दी। लेकिन इस बदलाव के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है, जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर देगी। सरकार ने दो ऐसे विधायकों को सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया, जिनके पास प्रशासन या राजनीति का कोई पुराना अनुभव नहीं है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उन्हें राज्य के दो सबसे ताकतवर और मलाईदार विभाग सौंपे गए हैंवित्त मंत्रालय और लोक निर्माण विभाग (PWD)

Written and published by Deepak Sriram, Delhi, 24 May 2026, Saturday, 5:52 PM IST

ऊपर से देखने पर यह एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया लग सकती है। लेकिन जब आप इसकी परतों को हटाएंगे, तो दिमाग में एक ही तीखा सवाल कौंधेगा—आखिर इन दोनों को ही क्यों चुना गया?

कौन हैं ये नए मंत्री?

इन दोनों मंत्रियों की पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) बेहद दिलचस्प है। ये दोनों पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर आए हैं और ज़मीनी स्तर के राजनीतिक संघर्ष से इनका कोई नाता नहीं रहा है। इनका सीधा संबंध देश के बड़े कॉर्पोरेट घरानों से है।

इनमें से एक मंत्री तमिलनाडु के 3,000 करोड़ के विशाल शिक्षा साम्राज्य के दामाद हैं, तो दूसरे मंत्री का सीधा पारिवारिक रिश्ता भारत के एक बहुत बड़े लॉटरी व्यवसायी से है।

शासन चलाने का कोई अनुभव न होने के बावजूद, आज ये दोनों निम्नलिखित विभागों को नियंत्रित कर रहे हैं:

वित्त मंत्रालय: जो पूरे राज्य के बजट, खर्चों और आर्थिक नीतियों की दिशा तय करता है।

लोक निर्माण विभाग (PWD): जो हर साल सड़कों, पुलों और सरकारी इमारतों के निर्माण के लिए हज़ारों करोड़ रुपये के ठेके (टेंडर्स) बांटता है।

चुनावी राजनीति और उद्योगपतियों का गठजोड़

आइए भारतीय राजनीति के उस कड़वे सच को स्वीकार करें जिसे अक्सर छुपाया जाता है। भारत में चुनाव लड़ना बेहद खर्चीला काम है। राजनीतिक दलों को चलाने, रैलियां करने और कार्यकर्ताओं को संभालने के लिए भारी-भरकम धन की आवश्यकता होती है। जो रसूखदार उद्योगपति इन पार्टियों को चंदा देते हैं, वे बदले में सिर्फ पैसे की उम्मीद नहीं रखते; बल्कि वे सरकार तक सीधी पहुँच, नीतियों में प्रभाव और सरकारी संरक्षण चाहते हैं।

ऐसे बड़े चंदादाताओं के दामादों या परिजनों को सीधे मंत्री पद सौंप देना इस प्रभाव को सुनिश्चित करने का सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। दामाद जी मंत्री की कुर्सी पर बैठते हैं, व्यवसायी परिवार को सरकार का सीधा रास्ता मिल जाता है, और बिना किसी कानूनी पचड़े के बड़े-बड़े ठेके आसानी से दे दिए जाते हैं।

कांग्रेस की चुप्पी पर खड़े होते सवाल

यह मामला केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति के दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है।

कांग्रेस पार्टी और विशेष रूप से राहुल गांधी ने अपनी पूरी राजनीति "क्रोनी कैपिटलिज्म" यानी 'पूँजीपति मित्रों की सरकार' पर हमला करते हुए खड़ी की है। "सूट-बूट की सरकार" का नारा हो या कॉर्पोरेट घरानों पर लगातार तीखे बाण, कांग्रेस हमेशा खुद को गरीबों का मसीहा और पूँजीपतियों का विरोधी बताती आई है।

अब दिलचस्प बात यह है कि डीएमके, कांग्रेस की सबसे प्रमुख सहयोगी पार्टी है। जब डीएमके ठीक वही काम करती है जिसका आरोप कांग्रेस दूसरों पर लगाती है, और पूरी कांग्रेस पार्टी इस पर चुप्पी साध लेती है, तो एक न्यायसंगत सवाल उठता है: क्या पूँजीपतियों के खिलाफ वह सारा आक्रोश सिद्धांतों पर आधारित था, या फिर गुस्सा सिर्फ इस बात का था कि मलाई किसे मिल रही है?

आम जनता पर इसका क्या असर होगा?

वित्त और पीडब्ल्यूडी जैसे महत्वपूर्ण विभागों को अनुभवहीन हाथों में सौंपना एक बड़ा जोखिम है। तमिलनाडु देश की एक बड़ी आर्थिक शक्ति है। यहाँ लिए गए गलत फैसले सीधे तौर पर जनता के स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों और रोज़गार को प्रभावित करते हैं।

आगामी चुनावों में विपक्षी दल इस मुद्दे को यकीनन एक बड़ा हथियार बनाएंगे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने आम जनता को एक बार फिर उसी हताशा भरे सच से रूबरू करा दिया है—भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ बोलना सिर्फ दूसरों पर वार करने का एक साधन है, खुद का आत्मनिरीक्षण करने का आईना नहीं। किसी ने ठीक ही कहा है कि 'चुनिंदा मामलों में साधी गई चुप्पी' कभी बेदाग नहीं होती।

 

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