क्या इस्कॉन संस्थापक स्वामी प्रभुपाद पशुओं पर ये अत्याचार होने देते...

क्या हुआ जब इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद ने अपने कमरे में एक मकड़ी को देखा, ये किस्सा जानने से पहले, समझते हैं कि कौन थे Srila Prabhupaad और क्यों दुनिया भर में हैं उनके लाखों शिष्य
Written by Deepak Sriram, New Delhi, Published by Deepak Sriram, 28 November, Friday, 3:55 PM IST
इस्कॉन International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) एक अंर्तराष्ट्रीय धार्मिक संगठन है जिसके संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदान्ता स्वामी प्रभुपाद हैं। स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में अमरीका में इस्कॉन की स्थापना की थी। प्रभुपाद ने जब यह धार्मिक यात्रा शुरु की तब उनकी आयु 60 वर्ष से भी अधिक थी और वह दिल की बिमारी से जूझ रहे थे। जल यात्रा उनके वृद्ध शरीर के लिए परेशानियां खड़ी कर सकती थी, फिर भी इस्कॉन की स्थापना के लिए उन्होंने अमरीका जाने के लिए वह कठिन यात्रा की और यात्रा के दौरान उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा, मगर वो अपने बचने को ईश्वर की कृपा बताते थे
आज उनके द्वारा स्थापित इस संगठन ने दुनिया भर में 400-600 मंदिर बना दिए हैं, जो श्रीमद्भागवत का प्रचार-प्रसार करने में दिन-रात लगे रहते हैं। इन मंदिरों से भूखे लोगों को मुफ़्त प्रसाद दिया जाता है और वृंदावन में कई स्कूलों के बच्चों को बस्ते, किताबें व दोपहर का खाना भी दिया जाता है।
वापस आते हैं मकड़ी और स्वामी प्रभुपाद के किस्से पर
ये बात है एक दिन की जब श्रीलप्रभुपाद अपने कक्ष में भजन-कीर्तन कर रहे थे, तभी अचानक वह ज़ोर से लगभग चिल्लाते हुए किसी शिष्य को बुलाने लगे। जब शिष्य आया तो उसने पूछा, क्या हुआ प्रभु?
तब स्वामी बोले इसको उठाओ और बाहर छोड़कर आओ, पहले तो शिष्य को कुछ समझ नहीं आया और उसने पूछा किसको, मुझे कुछ यहां कुछ दिखाई नहीं दे रहा, फिर पूछने पर प्रभुपाद ने इशारा करते हुए बताया कि इस मकड़ी को उठाओ, शिष्य को लगा होगा कि स्वामी जी मकड़ी से डर गए, मगर फिर प्रभुपाद बोले, ध्यान से उठाना, मर ना जाए। एक वह संत थे, जो एक मकड़ी तक को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते थे और एक तरफ़ हम इंसान, आज की सरकार व कोर्ट है, जो कुछ कुत्तों के द्वारा किए गए हमलो के कारण, सब कुत्तों को गलियों व सड़कों से हटाना चाहते हैं। जिसके लिए उनके पास कोई ठोस व्यवस्था तक नहीं है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” मतलब “पूरा संसार एक परिवार है।” में मानने वाला भारत, क्या इन बेज़ुबानों को अपना परिवार नहीं मानता जबकि स्वीडन देश ने जानवरों के हित में कानून बना कर एक अनोखी मिसाल कायम की है। कुत्तों की वफ़ादारी पर फ़िल्में व कहानियां तो बहुत हैं, मगर आज उन्हीं बेघर, बेज़ुबानों को उनकी गली और सड़क से भी हटाया जा रहा है। आज श्रीलप्रभुपाद हमारे बीच होते, तो क्या पशुओं पर ये अत्याचार होने देते? क्या सरकार जनता के साथ मिलजुल कर एक ऐसे निर्णय तक नहीं पहुंच सकती, जिससे मासूम पशुओं के घर न छिनें और शहरों व गलियों को सुरक्षित भी किया जा सके?
आशा है सरकार व कोर्ट जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए आपसी ताल-मेल के साथ एक ऐसे नतीजे पे पहुंचेंगे जो नागरिकों व बेसहारा पशुओं दोनों के हित में हो।
For feedback, suggestions, or claims regarding published content, please contact us @ deepak@newsbharatpratham.com / newsbharatpratham@gmail.com