इसलिए ई-रिक्शा हादसों में होती हैं इतनी मौतें...

जिन शहरों में ई-रिक्शा चलते हैं वहाँ इनसे संबंधित हादसे ना हुए हों ये नामुमकिन है। आपने कई ख़बरें सुनी होंगीं, जिनमें लोगों को चोटें आईं और कई जाने भी गईं। कई बार तो लगता है कि ये आबादी कम करने की कोई गुप्त सरकारी योजना तो नहीं।
Written by Deepak Tak, New Delhi, Published by Deepak Tak, 12 May 2026, Tuesday, 10:40 PM IST
वहीं ये ई-रिक्शा ट्रैफिक में कितनी बड़ी बाधा डालता है, ये बताने की ज़रूरत नहीं है। लगता है, ई-रिक्शा चालकों को किसी भी परीक्षा से नहीं गुजरना पड़ता है। ई-रिक्शा चालकों को कोई लाइसेंस रखने की ज़रूरत नहीं होती, मानो लाइसेंस साथ में रखना जैसे कोई बोझ ढोने जैसा हो। इन्हें किसी नम्बर प्लेट का टन्टा भी नहीं पालना पड़ता।
अधिक्तर ई-रिक्शा चालक युवा होते हैं और उन्हें हर सवारी रू 20 को नोट नज़र आती है। ये कहीं भी सवारी लेने के लिए, कभी भी रिक्शा रोक देते हैं। चाहे वो सड़क के बीचों-बीच ही क्यों ना हो या चाहे सवारी को रॉन्ग साइड ही क्यों ना छोड़ कर आना हो। ई-रिक्शा चालक सवारी को लेने के लिए चलते हुए रिक्शे को बीच सड़क पर कहीं भी रोक देते हैं। बिना इस डर के पीछे आने वाली गाड़ी उनके ई-रिक्शा से टकरा सकती है और उसमें कई लोगों को जान जा सकती है।
यह कोई नई बात नहीं हैं, ऐसा कई हादसों में हुआ भी है। ई-रिक्शा चालकों को ट्रैफिक के नियमों को मानना मना लगता है। उनके लिए कोई रॉन्ग साइड ही राइट साइड है। वो किसी भी तरफ से ई-रिक्शा को लेकर आ सकते हैं। ई-रिक्शा के कारण होने वाले हादसों को समझने के लिए किसी सर्वे की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है। आप 10 मिनट किसी भी ऐसे शहर की सड़क पर खड़े हो जाएं जहां ई-रिक्शा चलते हैं। आप खुद एक जीती जागती गवाही बन जाएंगे। आप देखेंगे। ई-रिक्शा चालक पैर पर पैर रख के ई-रिक्शा को कितनी स्पीड से दौड़ाते हैं और कई ई-रिक्शा चालकों के रिक्शो में गाने भी बहुत ज़ोर-ज़ोर से बजते हैं, लगता है मानो वो किसी डीजे वाले को कॉम्पिटिशन दे रहे हों। जब तक ई-रिक्शा की बैटरी फुल रहती है तब तक उनकी गति बनी रहती है। जैसे ही बैटरी कम होती है, रिक्शा की स्पीड भी कम होती जाती है और इसी तरह यह ट्रैफिक जाम का कारण भी बनता है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) आंकड़ों व NCRB के रिपोर्ट अनुसार ई-रिक्शा हादसों में 2018 से 2024 तक कुल 31,21,837 हादसों में 11,25,455 मौतें हुई हैं लेकिन सरकार ये आंकड़ा कभी किसी एक प्लैटफ़ार्म पर कभी नहीं दिखाती अलग-अलग राज्य अपने-अपने आंकडे रखते हैं।
लेकिन क्या इन हादसों के लिए केवल ई-रिक्शा चालक ही ज़िम्मेदार हैं। क्या सवारियां भी बराबर की ज़िम्मेदार नहीं। क्या सवारी की गलती नहीं? यह गलती उन सवारियों की भी है जो सड़क के बीचों बीच ही रिक्शा रोक कर रिक्शा में बैठना चाहते हैं, या कहीं भी अचानक रुकवा कर उतर जाना चाहते हैं। रिक्शा रॉन्ग साइड भी चल रहा हो तो उसको रोकते नहीं हैं। अपना काम जल्दी बन जाए उसके लिए रॉन्ग साइड भी जाने को तैयार हो जाते हैं। इस तरह सवारी व चालक दोनों मिलकर जानलेवा हादसों को न्यौता देते हैं।
लेकिन सरकार ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी, इन ई-रिक्शा चालकों के लिए क्या सुविधाएं की हैं। क्या नियम बनाए हैं?
लाइसेंस की क्या प्रक्रिया है?
क्या इन्हें किसी तरह की ट्रेनिंग दी जाती है?
क्या इन्हें कोई नियमावली पढ़ाई जाती है?
नियम ना मानने पर क्या इन पर कोई कानूनी कार्यवाही की जाती है।
ये समझ पाना बेहद मुश्किल है। क्योंकि जिस तरह से ई-रिक्शा सड़कों पर चलते हैं, कोई कह नहीं सकता कि ये किसी नियमों को मानते हैं या हादसों को टालने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन बात घूम फिर कर वहीं आती है क्या, गलती अकेले ई-रिक्शा चालकों की है? ज़िम्मेदारी रिक्शा चालकों की और सवारी दोनों की है। एक के समझने से कोई बात नहीं बनेगी, जब दोनों समझेंगे। तब समझ आएगा कि ई-रिक्शा की सवारी भी एक आरामदायक सवारी हो सकती है। रिक्शा चालक के लिए भी। और सवारी के लिए भी।
ये ज़िम्मेदारी दोनों ही पक्षों को लेनी पड़ेगी और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ये हादसे बढ़ते जाएंगे। सरकार द्वार कुछ किया जाएगा इसकी आशा व इंतज़ार ना करते हुए सवारी और चालक ही खुद से ज़िम्मेदारी का एहसास करते हुए, अच्छी सवारी बनना होगा और रिक्शा वालों को अच्छे ई-रिक्शा वाले बनना होगा।
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