न सेना, न ताकतवर हथियार — दुनिया की राजनीति बदल रहे छोटे देश...

दुनिया के नक्शे पर कुछ देश ऐसे हैं जिन्हें ढूँढने के लिए शायद आपको ज़ूम करना पड़े, कुछ देशों की आबादी दिल्ली की किसी कॉलोनी से भी कम है। कुछ इतने छोटे और समुद्र के इतने करीब हैं कि वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि अगर समुद्र का स्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले दशकों में वे हमेशा के लिए नक्शे से गायब हो सकते हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि पिछले तीस सालों में दुनिया की कई बड़ी नीतियों को बदलने में इन छोटे देशों ने ऐसी भूमिका निभाई है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
इनके पास न विशाल सेना है, न परमाणु हथियार, न अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था। फिर भी दुनिया की सबसे ताकतवर ताकतें इनकी बात सुनने को मजबूर हुई हैं। यह कोई चमत्कार नहीं है। यह एक ऐसी रणनीति है जिसे इन देशों ने बेहद समझदारी से अपनाया है।
जब छोटे देशों ने ताकत का नया मतलब समझा
आम तौर पर जब हम वैश्विक शक्ति की बात करते हैं, तो हमारे मन में अमेरिका, चीन या रूस जैसे देशों की तस्वीर उभरती है। विशाल सेनाएँ, युद्धपोत, मिसाइलें और आर्थिक ताकत — यही शक्ति के पारंपरिक प्रतीक माने जाते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति हमेशा बंदूक और पैसों से नहीं चलती।
Read in English: No Army Still - How Small Nations Are Winning at Global Politics
संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के हर देश को, चाहे वह कितना भी बड़ा या छोटा हो, सिर्फ एक वोट मिलता है। अमेरिका का भी एक वोट और किसी छोटे द्वीप राष्ट्र का भी एक वोट। यहीं से इन छोटे देशों की असली ताकत शुरू होती है।
एक ऐसी लड़ाई जिसमें ताकत नहीं, सच्चाई काम आई
प्रशांत और हिंद महासागर के छोटे-छोटे देशों—तुवालू, फिजी, पलाऊ, मालदीव और वानुआतु—ने बहुत पहले समझ लिया था कि उनके पास भले ही सैन्य ताकत न हो, लेकिन उनके पास एक ऐसी चीज़ है जिसका जवाब देना दुनिया के लिए मुश्किल है। वह थी उनकी अपनी हकीकत।
जलवायु परिवर्तन उनके लिए कोई भविष्य की समस्या नहीं थी। यह उनके वर्तमान का हिस्सा था। समुद्र धीरे-धीरे उनकी जमीन निगल रहा था, गाँव डूब रहे थे और लोगों का भविष्य खतरे में पड़ रहा था। उन्होंने इसी सच्चाई को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
जब पूरी दुनिया का ध्यान उनकी ओर गया
कई वर्षों तक जलवायु परिवर्तन पर होने वाली अंतरराष्ट्रीय बैठकों में बड़े औद्योगिक देश ही नियम तय करते थे। वे लक्ष्य तय करते, समय सीमा तय करते और अपनी सुविधानुसार समझौते तैयार करते, लेकिन फिर छोटे द्वीपीय देशों ने खेल बदल दिया।
तुवालू के प्रतिनिधियों ने दुनिया को दिखाने के लिए समुद्र के पानी में खड़े होकर संयुक्त राष्ट्र को संबोधित किया कि बढ़ता हुआ जलस्तर उनके लिए क्या मायने रखता है।
मालदीव की सरकार ने तो समुद्र के भीतर कैबिनेट बैठक आयोजित कर दी। तस्वीरें पूरी दुनिया में फैल गईं।
यह सिर्फ प्रचार नहीं था। यह एक ऐसा संदेश था जिसे दुनिया नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी।
धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन की चर्चा आँकड़ों और रिपोर्टों से निकलकर इंसानी कहानियों की चर्चा बन गई।
1.5 डिग्री की लड़ाई
आज दुनिया के जलवायु समझौतों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस लक्ष्य के पीछे सबसे बड़ी भूमिका इन्हीं छोटे द्वीपीय देशों की थी।
कई बड़े देश 2 डिग्री सेल्सियस तक तापमान वृद्धि स्वीकार करने को तैयार थे। लेकिन छोटे देशों ने साफ कहा कि उनके लिए यह सिर्फ एक संख्या नहीं है।
यह उनके अस्तित्व का सवाल है। उन्होंने लगातार दबाव बनाया और अंततः दुनिया को उनकी बात माननी पड़ी।
जब छोटे देश एकजुट हुए
अकेले किसी छोटे देश की आवाज़ बहुत दूर तक नहीं पहुँच सकती थी। इसलिए उन्होंने मिलकर एक समूह बनाया, जिसे "एलायंस ऑफ स्मॉल आइलैंड स्टेट्स" यानी AOSIS कहा जाता है।
चालीस से अधिक द्वीपीय और तटीय देश इस मंच से जुड़े। अब वे अलग-अलग आवाज़ें नहीं थे। वे एक संगठित समूह थे, जिसे दुनिया की बड़ी शक्तियाँ आसानी से नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थीं।
वे गठबंधन बनाते, समर्थन जुटाते और हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने मुद्दों को जीवित रखते।
कहानी कहने की ताकत
इन छोटे देशों की सबसे बड़ी शक्ति शायद वोट नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी शक्ति कहानी सुनाने की कला थी। जब लोग यह सुनते हैं कि एक पूरा देश समुद्र में डूब सकता है, तो यह सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रह जाती। यह एक मानवीय कहानी बन जाती है। सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक, इन देशों की आवाज़ दुनिया भर में पहुँची। आम लोगों ने सुना, समझा और फिर अपने नेताओं पर दबाव बनाया। यही नैतिक शक्ति धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति में बदल गई।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत का इन देशों से विशेष रिश्ता है।
हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र के कई द्वीपीय देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध रहे हैं।
इन देशों का समर्थन करना केवल सहानुभूति का विषय नहीं है। यह एक दूरदर्शी कूटनीतिक रणनीति भी है।
ऐसा करके भारत न केवल अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत कर सकता है, बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व की भूमिका भी निभा सकता है।
आने वाले वर्षों में जब जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनेगा, तब भारत और छोटे द्वीपीय देशों की साझेदारी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक हो सकती है।
दुनिया को मिला एक बड़ा सबक
इन छोटे देशों ने दुनिया को एक ऐसी बात सिखाई है जिसे कोई सैन्य बजट नहीं खरीद सकता।
जब अस्तित्व का सवाल हो, जब सच आपके साथ हो, और जब आप अपनी बात साहस और स्पष्टता के साथ रखें, तब आकार मायने नहीं रखता। कई बार दुनिया को बदलने के लिए विशाल सेना नहीं, बल्कि एक सच्ची आवाज़ ही काफी होती है।
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