ईश्वर भक्ति के साथ- साथ और भी कई संदेश देती है हनुमान अंश

हनुमान अंश केवल भक्ति को लेकर आपके विश्वास को गहरा नहीं करती बल्कि यह संदेश भी देती है कि एक पुत्र का अपनी माँ के लिए कितना प्रेम हो सकता है।
माँ के लिए प्रेम
जब-जब महाराज जी से पूछा जाता है कि तुम क्या करना चाहते हो, कहाँ जाना चाहते हो? उनका उत्तर यही होता है कि मुझे राम जी से मिलना है और जब एक संत उनसे पूछते हैं—क्यों? तो वह कहते हैं क्योंकि मेरी माँ राम जी के पास चली गई है और मुझे उनसे राम जी के पास जाकर मिलना है।
समाज सेवा और देशभक्ति
वो सीन लगभग बाबा जी के जानने वाले सभी भक्तों को ध्यान है जब उन्होंने वह ट्रेन रोक दी थी, जिससे उन्हें उतारा गया था। और जब उस ट्रेन को चलाने के लिए महाराज जी के पास अंग्रेज अफसर और अंग्रेज राज में नौकरी करने वाले एक भारतीय अफसर भी उनसे आकर प्रार्थना करते हैं तो महाराज जी अपने लिए कुछ न मांगकर सभी संतों के लिए अंग्रेज अफसर से कहते हैं कि आज के बाद कभी भी किसी संत को ट्रेन से न उतारा जाए, चाहे उनके पास टिकट हो चाहे न हो।
दूसरी शर्त यह भी रखते हैं कि इस जगह पर एक स्टेशन बना दिया जाए ताकि आसपास के लोगों को ट्रेन न रुकने की दिक्कत का सामना न करना पड़े।
अंग्रेज अफसर शुरुआत में बस कहने को सॉरी कह देता है, परंतु महाराज जी कहते हैं—ट्रेन हमने नहीं, हनुमान जी ने रोकी है। माफी मुझसे नहीं, हनुमान जी से मांगिए।
तब महाराज जी की बात सुनकर अंग्रेज अफसर आसमान की तरफ देखकर कहते हैं, “I am sorry God” और महाराज जी के सामने हाथ जोड़कर उन्हें ट्रेन में चलने का आग्रह करते हैं। और जैसे ही महाराज जी ऐसा करते हैं, वह ट्रेन चल पड़ती है।
संन्यास के नियम
ईश्वर भक्ति, देशभक्ति, मातृभक्ति के बाद एक दृश्य वह भी है जब महाराज जी के पिताजी उन्हें लेने आते हैं और उन्हें बताते हैं कि संन्यास क्या है।
संन्यास घर छोड़कर भाग जाना नहीं, अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह फेर लेना नहीं, बल्कि अपने घर में जो ब्याहता स्त्री आई है उसका ध्यान रखना भी है।
इससे कहीं न कहीं विशाल चतुर्वेदी की लेखनी ने संदेश दिया है कि जब तक पुरुष कुंवारा है तो उसको संन्यास लेने के लिए अपने माता-पिता से प्रार्थना कर उनकी हामी लेनी होती है और यदि वह शादीशुदा हो गया है तो संन्यास लेने से पहले उसे अपनी पत्नी से आज्ञा लेनी होती है।
वहीं इस एक दृश्य में यह भी है जब एक मठाधीश महाराज जी से पूछते हैं, जब महाराज जी बालरूप में होते हैं, कि ध्यान कहाँ लगाते हो। आम धारणा है कि भृकुटि के बीच में ध्यान लगाना चाहिए मगर मठाधीश कहते हैं—नहीं, पहले ध्यान आपको मूलाधार चक्र पर लगाना है और उसके बाद सभी चक्र जागृत होते-होते तब आप भृकुटि के बीच में पहुँचते हैं।
अब इसमें कितना सच है, कितना नहीं, यह केवल ध्यान को और गहराई से जानने वाले जानें या आप खुद अपना अनुभव करके इसको जानें।
धर्मशाला का वह भावुक दृश्य
क्रांतिकारी का धर्मशाला छोड़ते हुए जो दृश्य है, उसे शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता, क्योंकि क्रांतिकारी एक नास्तिक स्वभाव का व्यक्ति दिखाया गया है, जो मंदिरों और संतों पर विश्वास नहीं रखता।
मगर जब महाराज जी आकर उसे बताते हैं—तुम इतने दिन से भूखे हो, आओ मेरे कमरे में आकर खाना खाओ—जाते वक्त उसे आशीर्वाद देते हैं, उसके मस्तक पर तिलक लगाते हैं और उसे कहते हैं कि लद्दाख की तरफ चले जाना और कुछ गर्म कपड़े रख लेना, वहाँ सर्दी बहुत पड़ती है।
जाते वक्त जब उसका मित्र कहता है कि महाराज जी को प्रणाम करते जाना, क्रांतिकारी का यह कहना कि मैं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का मेंबर हूँ, मैं मंदिरों और इन साधु-संतों के ढकोसलों में नहीं मानता और मैं किसी को प्रणाम करके नहीं जाने वाला।
मगर यह दृश्य देखते ही बनता है जब वह महाराज जी को लगभग अनदेखा करके उनके पास से गुजरता है और वापस पलटकर महाराज जी के पास आता है और प्रणाम करता है। तब महाराज जी उसे आगे का रास्ता कैसे तय होगा, यह बताते हैं और अपनी एक लाठी और एक चादर ओढ़ा देते हैं। और इसी दृश्य में, क्योंकि क्रांतिकारी के पीछे पुलिस भी लगी है, पुलिस ढूंढते हुए उसी धर्मशाला पर पहुँच जाती है।
क्रांतिकारी का विश्वास इतना बढ़ा हुआ होता है कि वह आती हुई पुलिस की जीप में डंडा मारते हुए कहता है—“सीताराम।” और फिर वह आगे निकल जाता है।
दरवाजे पर दस्तक और “सीताराम”
इस दृश्य से पहले क्रांतिकारी के कमरे के दरवाजे पर जब एक दस्तक होती है, तो डर के कारण क्रांतिकारी हाथ में बंदूक थाम लेता है और अपने मित्र को एक लाठी थमा देता है। वह दरवाजा खोलने का इशारा करता है और जैसे ही दरवाजा खुलता है, सामने महाराज जी दिखाई देते हैं और कहते हैं—“सीता राम।”
इस दृश्य का बैकग्राउंड म्यूजिक इतना बेहतरीन फिल्माया गया है। जैसे ही दरवाजा खुलता है, ॐ की ध्वनि के साथ श्रीकृष्ण दास जी की आवाज पूरे हॉल में गूंज उठती है और आपको भक्ति के माहौल में ले जाती है। यही वह क्षण है जहाँ फिल्म केवल कहानी नहीं रह जाती। संगीत, दृश्य, संवाद और भाव मिलकर दर्शक को उस वातावरण में ले जाते हैं।
क्रांतिकारी, जो कुछ समय पहले तक मंदिरों और साधु-संतों को ढकोसला मानता था, वही व्यक्ति महाराज जी के सामने सिर झुकाता है। उसके भीतर हुआ यह परिवर्तन किसी बड़े भाषण से नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे अनुभवों से दिखाया गया है जिन्हें फिल्म धीरे-धीरे दर्शक के सामने रखती है।
जब महाराज जी उसे भोजन देते हैं, आशीर्वाद देते हैं, माथे पर तिलक लगाते हैं, आगे का रास्ता बताते हैं, गर्म कपड़े रखने की सलाह देते हैं, अपनी लाठी और चादर देते हैं—तो यह सब उस व्यक्ति के लिए है जो शुरुआत में उनके विश्वास को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं था। लेकिन अंततः वही क्रांतिकारी पलटकर आता है और प्रणाम करता है। और फिर जब पुलिस उसके पीछे पहुँचती है और वह पुलिस की जीप में डंडा मारते हुए “सीताराम” कहकर आगे बढ़ जाता है, तो यह बदलाव अपने आप में फिल्म के सबसे भावुक हिस्सों में से एक बन जाता है।
कृष्णदास की भक्ति-मय आवाज़
कभी अमेरिका का एक युवक था जेफ्री कैगल संगीत प्रेमी था, लेकिन शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसकी आवाज़ ईश्वर प्रचार में काम आएगी।
वर्ष 1970 में कृष्णदास भारत आए और उनकी मुलाकात नीम करौली बाबा, महाराज जी से हुई। महाराज जी की छत्रछाया में जेफ्री के भीतर भक्ति जागी और वह बन गए कृष्णदास।
उनकी आवाज़ में संगीत नहीं, प्रभु का नाम बहने लगा। राम का नाम, हनुमान का नाम और कीर्तन के माध्यम से वही नाम दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचने लगा।
2013 में उन्हें ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया और ग्रैमीज़ ने उन्हें “Yoga’s Rock Star” कहा।
लेकिन शायद कृष्णदास की असली पहचान किसी पुरस्कार में नहीं बल्कि उस क्षण में है, जब उनके मुख से निकला “राम” किसी भक्त की आंखों में आंसू और हृदय में शांति भर देता है।
क्योंकि जब गुरु की कृपा हो जाए तो आवाज़ आपकी रहती है, लेकिन नाम केवल ईश्वर का होता है।
हनुमान अंश का अनुभव
यही वजह है कि हनुमान अंश को केवल एक फिल्म के रूप में देखना शायद इस अनुभव को छोटा कर देना होगा। इसमें भक्ति है, माँ के लिए बेटे का प्रेम है, देश के लिए संघर्ष है, गुरु और शिष्य का भाव है, संन्यास का अर्थ है और सबसे बढ़कर एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा है जो अविश्वास से विश्वास की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
और यही वह अनुभव है जिसे स्क्रीन पर देखने और केवल उसके बारे में पढ़ने में जमीन-आसमान का अंतर है।
आप इसके कितने भी रिव्यू पढ़ लीजिए, कितने भी शॉट्स देख लीजिए और कितने भी वीडियोज़ देख लीजिए, लेकिन जब तक आप इसे सिनेमा हॉल में बैठकर नहीं देखते, तब तक शायद आप उस वातावरण, उस संगीत, उन दृश्यों और उस भाव को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाएंगे।
क्योंकि कुछ फिल्में कहानी सुनाती हैं और कुछ फिल्में भाव महसूस कराती हैं। हनुमान अंश के ये दृश्य दूसरी श्रेणी में आते हैं।
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