आज यह है यूएन में भारत की साख...

UN में भारत की साख पर खास रिपोर्ट—कांग्रेस दौर की नैतिक छवि से लेकर भाजपा शासन में रणनीतिक ताकत तक, जानें वैश्विक मंच पर भारत का सफर।
News Bharat Pratham Desk, New Delhi Published by: Deepak Tak Date: 2 October 2025, Thursday, 11:16 PM IST
संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत की भूमिका हमेशा से चर्चा का विषय रही है। 1945 में संस्थापक सदस्य बनने के बाद से भारत की छवि अलग-अलग दौर में अलग तरह से उभरी। एक ओर कांग्रेस शासनकाल में भारत को "नैतिक शक्ति" और "शांति प्रिय राष्ट्र" के रूप में देखा गया, वहीं भाजपा (मोदी सरकार) के दौरान भारत एक "रणनीतिक और निर्णायक वैश्विक ताकत" के रूप में सामने आया।
कांग्रेस सरकारों के दौरान भारत की छवि
कांग्रेस ने लंबे समय तक केंद्र की सत्ता संभाली और विदेश नीति को गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) से जोड़ा।
नेहरू काल में भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में बनी, जो शांति और विकासशील देशों की आवाज़ को उठाता था। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव भी भारत को मिला, लेकिन तत्कालीन नेतृत्व ने इसे ठुकरा दिया।
इंदिरा गांधी के समय 1971 का बांग्लादेश युद्ध भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला रहा। हालांकि, 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद अंतरराष्ट्रीय आलोचना का भी सामना करना पड़ा।
मनमोहन सिंह के दौर में 2008 का भारत-अमेरिका परमाणु समझौता भारत की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि रहा, जिससे UN और IAEA स्तर पर भारत की ताकत का एहसास कराया गया। बावजूद इसके, पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर भारत को बार-बार दबाव झेलना पड़ा।
कुल मिलाकर, कांग्रेस शासन में भारत की छवि "नैतिक नेता" और "शांति दूत" की रही। हालांकि सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाने के कारण कई बार भारत की प्रभावशीलता सीमित दिखी।
भाजपा (मोदी सरकार) में भारत की नई पहचान
2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने विदेश नीति को और अधिक आक्रामक और रणनीतिक रूप दिया।
2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा, जिसे रिकॉर्ड 177 देशों का समर्थन मिला। इससे भारत की "सॉफ्ट पावर" की ताकत वैश्विक स्तर पर उभरी।
आतंकवाद पर भारत का रुख पहले से कहीं ज्यादा सख्त हुआ। मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करवाना भारत की कूटनीतिक जीत रही।
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत ने सक्रिय भूमिका निभाई और इंटरनेशनल सोलर एलायंस जैसी पहल ने भारत को पर्यावरणीय नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया।
2021-22 में जब भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना, तब उसने आतंकवाद और वैश्विक शांति पर कई अहम बहसों की अध्यक्षता की।
इस प्रकार, भाजपा शासन में भारत की छवि "आक्रामक, रणनीतिक और निर्णायक शक्ति" के रूप में सामने आई है।
कांग्रेस बनाम भाजपा: सीधा अंतर
कांग्रेस के शासन में भारत की पहचान एक ऐसे राष्ट्र के रूप में बनी, जो नैतिकता और शांति का संदेश देता है। भारत को "विकासशील देशों की आवाज़" माना गया, लेकिन सुरक्षा और आक्रामक कूटनीति के मोर्चे पर भारत अपेक्षाकृत कमजोर दिखता रहा।
वहीं, भाजपा शासन में भारत को एक ऐसी वैश्विक शक्ति के तौर पर देखा जाने लगा है, जो न केवल विकास और आर्थिक मजबूती की बात करता है, बल्कि आतंकवाद, सुरक्षा और जलवायु जैसे मसलों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। मोदी सरकार ने भारत को एक "निष्क्रिय शांति दूत" से बदलकर "सक्रिय वैश्विक खिलाड़ी" के रूप में पेश किया।
संयुक्त राष्ट्र में भारत की साख समय के साथ बदली है। कांग्रेस शासन में भारत "नैतिक नेतृत्व और शांति प्रिय राष्ट्र" के रूप में पहचाना गया, जबकि भाजपा शासन में उसकी छवि "रणनीतिक और निर्णायक शक्ति" की बनी। दोनों ही दौर की अपनी उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ रही हैं, लेकिन आज भारत को संयुक्त राष्ट्र में पहले से कहीं ज्यादा गंभीर, प्रभावशाली और सशक्त आवाज़ माना जाता है।
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