कर्नाटक में सत्ता संग्राम: कांग्रेस सरकार फिर अंदरूनी खींचतान में उलझी...

कर्नाटक की राजनीति इन दिनों विकास से ज़्यादा दरबार की साज़िश जैसी दिख रही है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री एक ही मेज़ पर बैठे ज़रूर हैं, लेकिन नज़रें कुर्सी पर टिकी हैं। कांग्रेस हाईकमान दिल्ली से सब देख तो रहा है, पर फैसला करने की हिम्मत नहीं जुटती दिख रही।
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार नेतृत्व संकट के सबसे गंभीर दौर से गुज़र रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही खींचतान अब छिपी नहीं है।
यह सिर्फ गुटबाजी नहीं, बल्कि सत्ता हस्तांतरण की खुली लड़ाई है, जिसका सीधा असर शासन और जनता पर पड़ रहा है।
साल 2023 में 224 में से 135 सीटें जीतकर कांग्रेस ने सत्ता संभाली थी। तब सिद्धारमैया के अनुभव और शिवकुमार की संगठन क्षमता को “परफेक्ट बैलेंस” बताया गया। लेकिन यही संतुलन अब सरकार के लिए बोझ बन गया है। विधानसभा सत्र 8 दिसंबर से शुरू होने वाला है और उससे पहले सियासी तनाव चरम पर है।
विवाद की जड़ है कथित अनलिखा ‘रोटेशन फॉर्मूला’। माना जाता है कि सिद्धारमैया पहले 30 महीने मुख्यमंत्री रहेंगे और इसके बाद शिवकुमार को कमान सौंपेंगे। नवंबर में आधा कार्यकाल पूरा होते ही शिवकुमार समर्थक—करीब 50–55 विधायक—दबाव बनाने लगे। उनका तर्क है कि वोक्कालिगा वोट बैंक को मज़बूत रखने के लिए वादा निभाना ज़रूरी है।
82 वर्षीय सिद्धारमैया किसी लिखित या मौखिक समझौते से इनकार करते हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि सरकार की स्थिरता के लिए नेतृत्व में बदलाव ठीक नहीं। समझौते के तौर पर दूसरा उपमुख्यमंत्री, कैबिनेट विस्तार और अहम पदों की पेशकश की गई, लेकिन शिवकुमार खेमे के लिए यह सब “आधी दाल, आधी रोटी” जैसा है। उनके लिए मुद्दा साफ है—सत्ता।
पिछले महीने यह टकराव सार्वजनिक हो गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में तंज़, टीवी डिबेट में बयानबाज़ी, दिल्ली के लगातार दौरे और चर्चित “इडली डिप्लोमेसी” ने हालात उजागर कर दिए। मुस्कानें हैं, लेकिन भरोसा कमजोर है। सिद्धारमैया 2028 की बात करते हैं, जबकि शिवकुमार का सवाल है—“अब नहीं तो कब?”
इस खींचतान में शासन सबसे बड़ा शिकार बन गया है। योजनाएं धीमी पड़ चुकी हैं, सिंचाई परियोजनाएं अटकी हैं। बेंगलुरु में शहरी विकास ठप है क्योंकि फंड और मंजूरी लटकी हुई है। अधिकारी मानते हैं कि जब मंत्री अपनी कुर्सी बचाने में लगे हों, तो फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। ग्रामीण योजनाएं रुकी हैं, शहरी समस्याएं बढ़ रही हैं और जनता का भरोसा लगातार टूट रहा है।
दिल्ली का कांग्रेस हाईकमान दुविधा में है। किसी एक नेता को खुला समर्थन देने पर बगावत का खतरा है, और फैसला टालने से सरकार और कमजोर हो रही है। लिखित समझौता न होने से हाईकमान बेबस भी है और जिम्मेदार भी।
विपक्ष, खासकर बीजेपी और जेडी(एस), मौके की ताक में है। अविश्वास प्रस्ताव और टूट की चर्चाएं तेज़ हैं।
अब कांग्रेस “बीच का रास्ता” तलाश रही है—सिद्धारमैया को तीन साल पूरे करने देना और फिर 2028 से पहले सत्ता परिवर्तन। लेकिन सवाल कायम है:
क्या कांग्रेस व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाकर कर्नाटक के जनादेश को बचा पाएगी, या सरकार दरबार की राजनीति में ही उलझी रह जाएगी?
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