कैसे अंग्रेजों के एक कानून ने सदियों पुरानी स्वीकार्यता छीन ली…
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भारत वो देश जिसने दुनिया को कामसूत्र दिया। वो देश जहां खजुराहो के मंदिरों में एक ही लिंग के प्रेम को पत्थरों पर खुलकर दिखाया गया। वो देश जहां किन्नर समुदाय को हजारों सालों तक सम्मान और सामाजिक पहचान मिली, फिर ऐसा क्यों है कि 2026 में भी लाखों LGBTQ + भारतीय अपने ही देश में सम्मान और बराबरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं? इसका जवाब भारत से नहीं, बल्कि ब्रिटेन से शुरू होता है।
वो कानून जो कभी हमारा था ही नहीं
जब अंग्रेज भारत आए, तो वो सिर्फ रेल और अंग्रेजी भाषा नहीं लाए। वो अपने साथ अपनी सोच, धार्मिक मान्यताएं और कानून भी लाए 1861 में भारतीय दंड संहिता में सेक्शन 377 जोड़ा गया।
इसमें “प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ संबंध” को अपराध कहा गया जिसने समलैंगिकता को गैरकानूनी बना दिया गया, लेकिन यहां एक बड़ी बात है जो बहुत लोग नहीं जानते। इस कानून से पहले भारत में ऐसी संस्थागत नफरत नहीं थी।

पुराने हिंदू ग्रंथों, संस्कृत साहित्य और लोक परंपराओं में अलग-अलग लिंग पहचान और प्रेम संबंधों का जिक्र मिलता है। किन्नर समुदाय जन्म और शादी जैसे मौकों पर खास जगह रखता था। कविता, कला और कहानियों में समान लिंग के रिश्ते दिखते थे।
कोई सरकार, अदालत या धार्मिक संस्था लोगों के प्यार पर फैसला नहीं सुनाती थी फिर आया अंग्रेजी शासन और धीरे-धीरे सब बदल गया।
अंग्रेज अपने धार्मिक नजरिए से समलैंगिकता को “गलत” मानते थे। उन्होंने यही सोच अपनी सभी कॉलोनियों में फैला दी। भारत ने भी इस सोच को इतना अपना लिया कि लोग इसे भारतीय संस्कृति समझने लगे लेकिन सच ये है कि यह सोच भारत की कभी नहीं थी।
आज का भारत – दो सोचों के बीच फंसा देश
आज भारत एक अजीब मोड़ पर है। एक तरफ 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 377 हटाकर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।
आज बड़े शहरों में लोग Pride Parade में खुलकर शामिल होते हैं। कंपनियां LGBTQ Inclusion Policies बना रही हैं। फिल्मों और वेब सीरीज में धीरे-धीरे क्वियर किरदारों को साधारण इंसान की तरह दिखाया जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ आज भी कई माता-पिता बच्चों को स्वीकार नहीं करते। कई जगहों पर चुपचाप Conversion Therapy होती है।
समान लिंग के जोड़े आज भी कानूनी शादी, गोद लेने और अस्पताल में परिवार की पहचान जैसे अधिकारों से दूर हैं। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भी Marriage Equality का फैसला संसद पर छोड़ दिया। यही आज के भारत की सच्चाई है।
एक इंसान जो दो दुनियाओं को जोड़ने की कोशिश कर रहा है
इसी माहौल में सामने आते हैं Ankit Bhuptani, जिन्हें लोग इंस्टाग्राम इंस्टाग्राम पे CitizenAnkit के नाम से जानते हैं।
वे सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं हैं।
वे UN और G20 Delegate, TEDx Speaker, DEI Leader, LGBTQ+ Rights Activist और Queer Hindu Alliance के संस्थापक हैं। उनका काम एक बहुत बड़ी सोच को चुनौती देता है कि क्वियर होना भारतीय या हिंदू संस्कृति के खिलाफ है। अंकित दिखाते हैं कि ऐसा नहीं है।

वे धार्मिक यात्राओं में जाते हैं, भक्ति की बात करते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलते हैं और साथ ही LGBTQ+ अधिकारों की भी बात करते हैं। उनका संदेश साफ है
आपको भारतीय होने और क्वियर होने में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं। उनका मानना है कि असली भारतीय परंपरा ने कभी लोगों को उनके प्यार के लिए शर्मिंदा नहीं किया।
वो नेता जिन्होंने रास्ता बनाया
सिर्फ एक्टिविस्ट ही नहीं, राजनीति में भी बदलाव आया।
Shabnam Mausi Bano भारत की पहली ट्रांसजेंडर जनप्रतिनिधि बनीं और मध्य प्रदेश विधानसभा तक पहुंचीं।
Madhu Bai Kinnar छत्तीसगढ़ में खुलकर ट्रांस पहचान के साथ मेयर चुनी गईं।
Apsara Reddy ने राष्ट्रीय राजनीति में ट्रांस प्रतिनिधित्व को नई पहचान दी।
और Manek Guruswamy ने खुले तौर पर क्वियर पहचान के साथ संसद तक पहुंचकर इतिहास बनाया।
इन लोगों ने साबित किया कि पहचान किसी की क्षमता तय नहीं कर सकती।
आगे क्या होगा, ये सबके लिए जरूरी है
ये सिर्फ LGBTQ+ लोगों का मुद्दा नहीं, ये सच, इतिहास और भारत के भविष्य का सवाल है।
हर साल हजारों युवा समझते हैं कि उनकी पहचान अलग है लेकिन उनमें से कई अकेले महसूस करते हैं।
उन्हें लगता है कि वे गलत हैं। जबकि असल में ये शर्म उनकी नहीं, बल्कि उस सोच की विरासत है जो 1861 में थोपी गई थी।
2018 का फैसला शुरुआत था। शादी के अधिकार, गोद लेने का अधिकार, काम की जगह सुरक्षा और परिवार की स्वीकार्यता की लड़ाई अभी बाकी है।
लेकिन बदलाव शुरू हो चुका है। लोग सोशल मीडिया पर बात कर रहे हैं।
नेता राजनीति में आवाज उठा रहे हैं, कार्यकर्ता अदालतों तक लड़ाई ले जा रहे हैं और धीरे-धीरे भारत अपनी पुरानी पहचान याद कर रहा है।
एक ऐसा देश जिसने कभी प्रेम के हर रूप को मंदिरों की दीवारों पर जगह दी थी।
भारत को समानता सिखाने की जरूरत नहीं, बस उसे अपनी ही कहानी फिर से याद करनी है।