प्रेमचंद: वह तलवार जैसी कलम जिसने खेत की मिट्टी को साहित्य बना दिया

हिंदी व उर्दू साहित्य में एक नाम ऐसा है जिसे पढ़े बिना भारत को समझना अधूरा रहता है। प्रेमचंद — जिनकी कहानियाँ स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में भी हैं और गाँव के उस बुज़ुर्ग की ज़बान पर भी जिसने शायद कभी कोई किताब हाथ में नहीं ली। वे जटिल को सरल बनाते थे, दूर की बात को दरवाज़े तक ले आते थे। उन्होंने उस भारत को लिखा जो अकसर साहित्य में नज़रअंदाज़ किया जाता था। किसान, मज़दूर, विधवा, दलित, स्त्री। उनकी कहानियाँ आज भी उतनी ही ज़रूरी लगती हैं जितनी सौ साल पहले थीं
Written by Anshita Nagar, Delhi, Published by Deepak Sriram, 28 May 2026, Thursday, 5:30 PM IST
31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में जन्मे धनपत राय श्रीवास्तव - दुनिया में प्रेमचंद के नाम से जाने गए। प्रेमचंद का बचपन दुखों से भरा था। जब वे आठ साल के थे तब माँ चल बसीं। पिता ने दूसरी शादी की और सौतेली माँ के साथ रिश्ता कभी सहज नहीं रहा। चौदह साल की उम्र में उनकी शादी एक ऐसी लड़की से कर दी गई जिसके साथ निभाना उनके लिए संभव नहीं था। पंद्रह साल की उम्र में पिता भी चले गए। इतने दुखों के बीच उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। किताबें किराये पर लेकर, ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुज़ारा करते हुए। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अध्यापक बने व बाद में स्कूल उपनिरीक्षक के पद तक पहुँचे लेकिन उनका असली काम लिखना था। बहुत छोटी उम्र से ही उन्होंने कहानियाँ और उपन्यास लिखने शुरू कर दिए।
शुरुआती दौर में उर्दू में लिखा, फिर हिंदी में और धीरे-धीरे दोनों भाषाओं के पाठकों के दिलों पर उनकी कहानियाँ छा गईं। उनकी कहानियों के किरदार किसी शीशमहल के नहीं, मिट्टी के घरों के थे। "गोदान" के होरी को जो पाठक एक बार पढ़ता है, वह उसे ज़िंदगीभर नहीं भूल सकता। होरी — एक किसान जो सारी उम्र एक गाय का सपना देखता रहा और अपनी सारी ज़िंदगी उस सपने की भेंट चढ़ा दी। यह सिर्फ एक उपन्यास नहीं था — यह भारतीय किसान की पूरी त्रासदी का दस्तावेज़ था। आज भी जब कर्ज़ में डूबे किसानों की खबरें आती हैं, होरी की याद दिलाती है।
"निर्मला", "सेवासदन", "रंगभूमि", "कर्मभूमि", "प्रेमाश्रम" — उनके उपन्यासों की यह सूची बताती है कि उनके लेखनी कितनी विस्तृत थी। "निर्मला" में दहेज और बाल विवाह की समस्या पर उन्होंने जो लिखा वह उस दौर के लिए बहुत साहसिक था। "सेवासदन" में वेश्यावृत्ति और समाज की पाखंडी नैतिकता पर उन्होंने सीधा प्रहार किया।
उनकी कहानियाँ तो और भी बेजोड़ हैं। "कफन", "पूस की रात", "नमक का दरोगा" व "बड़े घर की बेटी" — इन कहानियों ने हिंदी साहित्य को एक नई ऊँचाई दी। "ईदगाह" में हामिद का वह किरदार — जो मेले में सबकुछ छोड़कर अपनी दादी के लिए चिमटा खरीद लाता है — पढ़ते वक्त आज भी आँखें नम हो जाती हैं। "कफन" की वह कहानी जिसमें एक मृत स्त्री के कफन के पैसे उसके पति व ससुर शराब में उड़ा देते हैं। यह पढ़कर इंसान के भीतर एक हलचल-सी मच जाती है।
1907 में उन्होंने पहली बार उर्दू में "सोज़-ए-वतन" नाम से कहानियाँ प्रकाशित कीं जो देशप्रेम से ओत-प्रोत थीं। अंग्रेज़ सरकार ने इसे राजद्रोह माना और उनकी किताबें ज़ब्त कर ली गईं। लेकिन प्रेमचंद रुके नहीं। 1921 में जब गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। वह फैसला आर्थिक रूप से बहुत कठिन था लेकिन उनकी अंतरात्मा ने यही कहा।
1930 में उन्होंने "हंस" नाम की साहित्यिक पत्रिका शुरू की जो आज भी निकलती है। इसके ज़रिये उन्होंने कई नए लेखकों को मंच दिया। साथ ही "सरस्वती प्रेस" नाम का प्रकाशन संस्थान शुरू किया — जो आर्थिक रूप से कभी बहुत सफल नहीं रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
8 अक्टूबर 1936 को, महज़ छप्पन साल की उम्र में, प्रेमचंद इस दुनिया से चले गए। उस वक्त वे "मंगलसूत्र" उपन्यास लिख रहे थे जो अधूरा रह गया, लेकिन उन्होंने जो लिखा — वह इतना भरपूर है कि पूरी ज़िंदगी पढ़ते रहो तो भी खत्म न हो।
प्रेमचंद ने साहित्य को आम आदमी का हथियार बनाया। उन्होंने बताया कि कलम भी उतना ही बदल सकती है जितना कोई आंदोलन। उनकी कहानियाँ आज भी उतनी ताज़ी हैं क्योंकि भारत का वह किसान, वह स्त्री, वह दलित आज भी उन्हीं सवालों से जूझ रहा है जो प्रेमचंद ने सौ साल पहले उठाए थे। और जब तक ये सवाल हैं — मुंशी प्रेमचंद ज़िंदा हैं।
Share Your Comments
Related Posts
Richest Man in Babylon Summary: 5 Powerful Money Lessons for Financial Success...
A poor man who rises to become Babylon's richest man through discipline, prudent financial practices
Best book summary of The Intelligent Investor...
One of the book's most important ideas is "Mr. Market