महाश्वेता देवी: जिनकी कलम हाशिये के लोगों की आवाज़ बनी...
साहित्य की दुनिया में बहुत से लेखक हैं जो खूबसूरत भाषा में खूबसूरत कहानियाँ लिखते हैं लेकिन कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिनकी कलम सिर्फ कागज़ पर नहीं चलती। वह समाज के सीने पर लिखते हैं, उन ज़ख्मों को उघाड़ती है जिन्हें ताकतवर लोग ढककर रखना चाहते हैं। महाश्वेता देवी भी ऐसी ही लेखिका थीं। उन्होंने बांग्ला साहित्य को एक नई दिशा दी। वह दिशा जो आदिवासियों, बंधुआ मज़दूरों और वंचितों के दर्द की तरफ जाती थी। उनकी कलम में करुणा थी, आक्रोश था और सबसे ज़रूरी — बात सच बोलने की हिम्मत थी।
Written by Anshita Nagar, Delhi, Published by Deepak Sriram, 23 May 2026, Saturday, 9:40 PM IST
14 जनवरी 1926 को ढाका में जन्मी महाश्वेता देवी का परिवार साहित्यिक पृष्ठभूमि का था। उनके पिता मनीष घटक जाने-माने कवि थे और उनके चाचा ऋत्विक घटक बाद में महान फिल्मकार बने। ऐसे माहौल में महाश्वेता का रुझान स्वाभाविक रूप से लेखन की तरफ हुआ लेकिन उन्होंने जो राह चुनी, वह उनके परिवेश से कहीं आगे की थी।
विश्वभारती, शांतिनिकेतन और कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद महाश्वेता ने पत्रकारिता और अध्यापन दोनों किए। लेकिन असली मोड़ तब आया जब उन्होंने 1956 में "झाँसीर रानी" लिखी। रानी लक्ष्मीबाई पर एक विस्तृत उपन्यास, जिसके लिए उन्होंने गहरा शोध भी किया। यह किताब सिर्फ एक ऐतिहासिक कथा नहीं थी बल्कि यह उस स्त्री की कहानी थी जिसने उस दौर में भी अंग्रेज़ हुकूमत के आगे झुकने से इनकार किया था।
लेकिन महाश्वेता देवी की असली पहचान उनकी आदिवासी कहानियों से बनी। पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड के आदिवासी इलाकों में जाकर उन्होंने जो देखा, उसे उन्होंने बेबाकी से लिखा। "हज़ार चौरासी की माँ", "अरण्येर अधिकार", "बाएन", "द्रौपदी" ये रचनाएँ सिर्फ कहानियाँ नहीं थीं। ये दस्तावेज़ थे उस व्यवस्था के खिलाफ जो कमज़ोर को और कमज़ोर करती रहती है।
"हज़ार चौरासी की माँ" में नक्सल आंदोलन में शामिल बेटे को खोने वाली एक माँ का दर्द इतनी गहराई से उकेरा गया है कि पाठक पढ़ते-पढ़ते खुद उस माँ का हिस्सा बन जाता है। इस उपन्यास पर बाद में फिल्म भी बनी। "द्रौपदी" कहानी में एक आदिवासी महिला के साथ होने वाले अत्याचार का जो चित्रण है, वह पाठक को झकझोर देता है और यह सवाल पूछने पर मजबूर करता है कि आज़ादी के इतने साल बाद भी हाशिये के लोग न्याय से इतने दूर क्यों हैं।
महाश्वेता देवी की लेखनी और उनकी सक्रियता साथ-साथ चलती थी। वे केवल लिखती नहीं थीं। वे लड़ती भी थीं। बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ, आदिवासियों की ज़मीन छीने जाने के खिलाफ और सरकारी उपेक्षा के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज़ उठाई। उनकी पत्रिका "बोर्तिका" आदिवासी व वंचित समुदायों के मुद्दों को सामने लाने का एक ज़रूरी मंच बनी।
उनकी उपलब्धियों की सूची लंबी है, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, रमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म विभूषण लेकिन वे इन सम्मानों से कहीं बड़ी थीं। उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था, किसी आदिवासी बुज़ुर्ग का यह कहना कि "दीदी ने हमारी बात लिखी।"
जब 28 जुलाई 2016 को उनका निधन हुआ, तो बांग्ला साहित्य ने एक ऐसी आवाज़ खो दी जो दशकों तक गूँजती रही थी। लेकिन उनकी किताबें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, शायद और भी ज़्यादा।
महाश्वेता देवी ने साबित किया कि साहित्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं होता। वह समाज का आईना भी होता है और हथियार भी। उन्होंने अपनी कलम को कभी सत्ता के सामने नहीं झुकाया। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है और यही उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेगी।
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