प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान भारत से बेहतर?


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जब आप वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स देखते हैं, तो भारत का पड़ोसी पाकिस्तान 153वें नंबर पर और भारत 157वें नंबर पर दिखता है। वहीं वर्ल्ड हैप्पीनेस रैंकिंग में पाकिस्तान 104वें और भारत 116वें नंबर पर है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में जिन बातों को देखा जाता है, उनमें शामिल हैं।

कानूनी व्यवस्था (Legal Framework)

आर्थिक माहौल (Economic Context)

सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल (Sociocultural Context)

सुरक्षा की स्थिति (Security Indicator)

Read in English: Pakistan Is Happier Than India? 

 

वहीं वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में इन बातों को शामिल किया जाता है।

प्रति व्यक्ति आय (GDP per capita)

सामाजिक सहयोग (Social support)

स्वस्थ जीवन की उम्मीद (Healthy life expectancy)

अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आज़ादी।

दूसरों की मदद करने की भावना (Generosity)

भ्रष्टाचार को लेकर लोगों की सोच।

अन्य सभी बातों को अगर एक बार के लिए छोड़ भी दिया जाए और केवल सुरक्षा की स्थिति (Security Indicator) और प्रति व्यक्ति आय (GDP per capita) पर बात की जाए तो क्या वाकई पाकिस्तान व कई दूसरे देश इन मामलों में भारत से बेहतर हैं? भारत तो दूर, क्या कोई भी पढ़ा-लिखा और अपने देश का भला चाहने वाला पाकिस्तानी नागरिक यह मान सकता है कि सुरक्षा की स्थिति और प्रति व्यक्ति आय में पाकिस्तान भारत से बेहतर है?

क्या हम सच में मान लें कि जिस देश में अंदरूनी अस्थिरता या लगातार तनाव की खबरें आती रहती हैं। वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया या शासन से जुड़े इंडेक्स में भारत से ऊपर है? क्या सैन्य प्रभाव वाले देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से बेहतर स्कोर कर सकते हैं? जिन देशों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिरता के आरोप लगते हैं, वे आज़ादी, लोकतंत्र या लोगों की संतुष्टि को मापने वाले इंडेक्स में भारत से ऊपर हैं? भारत की यह तुलना केवल पाकिस्तान से नहीं, बल्कि अन्य कई देशों से भी की जा सकती है।

सबसे ज़रूरी सवाल, क्या ये ग्लोबल रैंकिंग हमेशा वही मापती हैं, जो लोग समझते हैं कि ये माप रही हैं। हाल ही में भारत में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। मुद्दा यह नहीं था कि भारत की तारीफ हो या आलोचना, सवाल यह था कि क्या इन ग्लोबल इंडेक्स को अंतिम सच मानने से पहले इनके तरीके और आधार को भी सवालों के दायरे में लाना चाहिए?

इन इंडेक्स का हर जगह ज़िक्र होता है, लेकिन इन पर सवाल नहीं उठते।

हर साल अखबारों और टीवी चैनलों में ऐसी खबरें दिखाई जाती हैं।

प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत नीचे गया।

डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत पीछे गया।

हैप्पीनेस रिपोर्ट में भारत उम्मीद से नीचे रहा।

इन रैंकिंग्स को इतनी बार दोहराया जाता है कि कई बार ये अंतिम सच लगने लगती हैं।

मगर इन इंडेक्स पर सवाल उठाने वाले लोग कहते हैं कि चर्चा अक्सर सिर्फ हेडलाइन तक सीमित रह जाती है। बहुत कम लोग यह देखते हैं कि ये रैंकिंग बनाई कैसे जाती है।

अगर सैन्य हस्तक्षेप, राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष या संस्थागत चुनौतियों से जूझ रहे देश भारत से ऊपर दिखते हैं, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि इन रैंकिंग्स के नियम और उनका वज़न तय कैसे किया गया है।

प्रेस फ्रीडम का सवाल: आखिर मापा क्या जा रहा है?

इन सभी रैंकिंग्स में मीडिया फ्रीडम इंडेक्स को खास ध्यान से देखने की ज़रूरत है क्योंकि ये दुनिया की राय बनाने में बड़ा असर डालते हैं।

प्रेस की आज़ादी किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी है। स्वतंत्र पत्रकारिता, सत्ता से सवाल और अलग-अलग विचार लोकतंत्र की पहचान हैं।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि प्रेस फ्रीडम को एक नंबर में बदल देना इतना आसान नहीं है।

ये सवाल पूछे जा सकते हैं।

इंडेक्स बनाने वाली संस्थाएं कौन से सैंपल, सर्वे और पैमाने इस्तेमाल करती हैं?

क्या इंडेक्स सिर्फ कानून देखता है या पत्रकारों की असली काम करने की स्थिति भी?

क्या बड़े लोकतंत्रों के आकार और विविधता को ध्यान में रखा जाता है?

विशेषज्ञों की राय और जमीन पर दिखने वाले नतीजों में कितना संतुलन है?

क्या हर देश के मीडिया माहौल को उसके अपने संदर्भ में समझा जाता है?

क्या हजारों अखबारों और बेहद प्रतिस्पर्धी मीडिया वाले देश की तुलना छोटे देशों से एक जैसे तरीके से की जा सकती है?

ये सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब रैंकिंग दुनिया की सोच को प्रभावित करने लगती है।

ये रैंकिंग सिर्फ खबर नहीं होती।

ये रिपोर्ट सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं बनती।

ग्लोबल मीडिया इनका इस्तेमाल करता है।

नीति बनाने वाली संस्थाएं इन्हें देखती हैं।

निवेशक इन्हें कई संकेतों में से एक मानते हैं।

इस वजह से लोगों की राय कई बार जमीन की हकीकत देखने से पहले ही बन जाती है।

अगर किसी देश को बार-बार कुछ चुनिंदा इंडेक्स के आधार पर दिखाया जाए, तो समझ अधूरी भी हो सकती है।

इससे दो खतरे पैदा होते हैं।

आलोचना जरूरत से ज्यादा हो सकती है या असली समस्याओं को जल्दी नज़रअंदाज़ किया जा सकता है

दोनों ही स्थिति सही नहीं हैं।

बड़ा सवाल: क्या एक ही पैमाना सबके लिए सही है?

एक और सवाल यह है कि क्या ये ग्लोबल रैंकिंग ऐसे ढांचे पर बनी हैं जो खास ऐतिहासिक और राजनीतिक सोच से प्रभावित हैं?

और क्या इन इंडेक्स के पीछे काम करने वाली संस्थाओं की सोच और प्राथमिकताएं भी असर डालती हैं?

बड़े, कई भाषाओं वाले और संघीय लोकतंत्र छोटे या ज्यादा केंद्रीकृत देशों से अलग तरीके से काम करते हैं।

तो सवाल यह है।

क्या एक ही ग्लोबल फ्रेमवर्क हर देश की हकीकत को बराबरी से समझ सकता है?

आलोचकों का कहना है कि अगर संदर्भ हटा दिया जाए, तो यूनिवर्सल रैंकिंग बहुत ज्यादा सरल बन सकती हैं।

ऐसे रिपोर्ट्स को पढ़ते समय क्या करें?

एक बेहतर तरीका यह हो सकता है।

इंडेक्स बनाने वाली संस्था को देखें।

देखें कि जमीन पर ये कितने व्यावहारिक लगते हैं।

रैंकिंग का पैटर्न समझें।

उसकी पद्धति (Methodology) पढ़ें।

कई अलग-अलग इंडेक्स की तुलना करें।

उनके असली संकेतकों को देखें।

और पूछें कि क्या नतीजे वास्तविकता से मेल खाते हैं।

प्रेस की आज़ादी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण है।

लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि हम यह समझें कि इन बातों को मापा कैसे जा रहा है और दुनिया के सामने पेश कैसे किया जा रहा है

ग्लोबल इंडेक्स पर सवाल उठाना गलत नहीं है। खासकर तब, जब वे दुनिया की राय, धारणा और देशों की छवि बनाने की ताकत रखते हों।

मकसद किसी देश का बचाव करना या उसे खारिज करना नहीं होना चाहिए। उद्देश्य यह होना चाहिए कि रैंकिंग जितनी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्या उसकी मापने की प्रक्रिया पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए।

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