पुष्कर: मेला जहाँ रेत भी गाती है और रेगिस्तान मुस्कुराता है...


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राजस्थान के अजमेर जिले से लगभग बारह किलोमीटर दूर एक छोटा सा शहर पुष्कर है। यह शहर अपनी धार्मिक शांति और ब्रह्मा मंदिर की वजह से तो जाना ही जाता है। लेकिन हर साल कार्तिक मास में, जब रेगिस्तान की हवा थोड़ी सर्द होने लगती है, तब यह शहर पूरी तरह बदल जाता है।

Written by Anshita Nagar, Delhi, Published by Deepak Sriram, 22 May 2026, Friday, 10:00 PM IST

हज़ारों ऊँट, लाखों लोग, रंग-बिरंगे कपड़े, लोकगीतों की गूँज और एक ऐसा माहौल जो दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकता — यही है पुष्कर मेला। यह सिर्फ एक पशु मेला नहीं है, यह राजस्थान की आत्मा का उत्सव है।

पुष्कर मेले का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर सरोवर में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसी कारण यहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इस तीर्थयात्रा के साथ एक विशाल पशु मेला भी जुड़ता गया और आज यह दोनों का अद्भुत संगम है — आस्था और उत्सव, परंपरा और जीवंतता।

मेले की शुरुआत आमतौर पर पूर्णिमा से पाँच-छह दिन पहले ही होती है। सबसे पहले हज़ारों की तादाद में ऊँट आते हैं। राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के पशुपालक अपने ऊँटों को सजा-धजाकर यहाँ लाते हैं। ऊँटों के गले में रंगीन मालाएँ, सिर पर कढ़ाई वाले कपड़े और पैरों में घुँघरू देखने को मिलते हैं। यह नज़ारा किसी को भी मोह लेता है। ऊँटों की खरीद-बिक्री यहाँ का सबसे बड़ा व्यापारिक आकर्षण है और कई बार एक-एक ऊँट की कीमत लाखों में पहुँच जाती है।

लेकिन पुष्कर मेला सिर्फ ऊँटों तक सीमित नहीं, यहाँ घोड़े, गाय, बैल और भेड़ें भी काफ़ी बड़ी संख्या में आती हैं। मेले के मैदान में एक तरफ पशुओं की चहल-पहल है और दूसरी तरफ दुकानों की कतारें — राजस्थानी गहने, हस्तशिल्प, रंग-बिरंगी चूड़ियाँ और मिट्टी के बर्तन। खाने-पीने के स्टॉलों पर दाल-बाटी-चूरमा और मावे की कचौरी की खुशबू हवा में घुली रहती है।

शाम होते-होते मेले का माहौल जादुई सा हो जाता है। लोकगायक अपनी मंडलियाँ सजाते हैं, कालबेलिया नृत्यांगनाएँ अपनी घूमती स्कर्टों के साथ थिरकती हैं और ढोल-मंजीरे की आवाज़ रात तक गूँजती  है। पुष्कर सरोवर के किनारे दीपों की रोशनी में आरती होती है। यह दृश्य इतना सुंदर होता है कि पलकें झपकाने तक का मन नहीं करता।

पिछले कुछ दशकों में पुष्कर मेला अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के बीच भी खासा लोकप्रिय हुआ है। यूरोप, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से सैकड़ों विदेशी सैलानी हर साल यहाँ आते हैं। उनके लिए यह मेला भारत की असली रंगत को सबसे करीब से देखने का मौका होता है। कई विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर इस मेले को कैमरे में कैद करने के लिए विशेष रूप से आते हैं। मेले के दौरान ऊँट-दौड़, ऊँट-सजावट प्रतियोगिता और "सबसे लंबी मूँछ" जैसे मज़ेदार आयोजन विदेशी मेहमानों को खूब भाते हैं।

स्थानीय लोगों के लिए यह मेला सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि एक पारिवारिक उत्सव है। दूर-दूर से रिश्तेदार मिलते हैं, पुरानी यादें ताज़ा होती हैं और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती है। एक बुज़ुर्ग पशुपालक ने कहा कि यह मेला नहीं, यह हमारी साँस है।"

पुष्कर मेला इस बात का सबूत है कि भारत की असली पहचान उसके गाँवों, उसके पशुपालकों और उसकी लोक परंपराओं के भीतर छिपी है। यह मेला हर साल याद दिलाता है कि आधुनिकता की दौड़ में हम जो पीछे छोड़ आए हैं, वह कितना अनमोल था। एक बार पुष्कर जाइए — लौटते वक्त मन में कुछ ऐसा होगा जो शब्दों में बयान नहीं हो सकता।

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