नदियों का संकट: झाग, ज़हर और जिम्मेदारी का बिखराव...


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गंगा नदि जिसे हम “मां” कहते हैं, आज भी झाग और गंदगी से जूझ रही है। बड़े-बड़े अभियान ज़मीन पर अधूरे दिखते हैं। वाराणसी के घाटों पर तैरता झाग सिर्फ पानी की हालत नहीं, हमारी नीतियों की हकीकत भी दिखा जाता है।

यह समस्या सिर्फ उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं। दक्षिण में गोदावरी और कृष्णा नदियाँ औद्योगिक कचरे से प्रभावित हैं। कई हिस्सों में “डेड ज़ोन” बन चुके हैं—जहां पानी है, मगर जीवन नहीं। कावेरी, जो कभी सभ्यताओं की जननी थी, आज शहरों के सीवेज का बोझ ढोती नज़र आ रही है।

बड़ी विडंबना यह भी है कि प्रदूषण सरहदें नहीं मानता, लेकिन हमारी नीतियां मानती हैं। एक राज्य की गंदगी दूसरे राज्य तक पहुंचती है—गाज़ियाबाद का कचरा आगरा के खेतों तक, हरियाणा का औद्योगिक अपशिष्ट दिल्ली के भूजल तक। फिर भी सरकारें अपने-अपने दायरे तक सीमित रहती हैं, जैसे नदियां नहीं, राजनीतिक सीमाएं हों।

इसी बिखरी व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ़ कहा—जब जिम्मेदारी कई एजेंसियों में बंटी हो, तो जवाबदेही गायब हो जाती है। कोर्ट ने हर ज़िम्मेदार संस्था की पहचान और जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया है। संदेश साफ़ है: अब लापरवाही नहीं चलेगी।

असली मुद्दा सीधा है—नदियां साझा धरोहर हैं। अगर एक राज्य प्रदूषण नहीं रोकता, तो वह दूसरे राज्य के पर्यावरण के साथ अन्याय करता है। “तू-तू, मैं-मैं” का दौर खत्म होना चाहिए।

अब आगे का रास्ता क्या है?

पहला - 2030 तक यह सुनिश्चित करना होगा कि बिना ट्रीट किया गया ज़रा सा कचरा भी नदी में न जाए। इसके लिए आधुनिक, पारदर्शी सिस्टम चाहिए, जहां हर डिस्चार्ज प्वाइंट पर निगरानी हो।

दूसरा - एक मज़बूत नेशनल रिवर अथॉरिटी का गठन जरूरी है, जिसके पास सख्त कानूनी अधिकार हों। ज़िम्मेदारी तय हो और लापरवाही पर कड़ी सज़ा मिले—चाहे कोई भी, किसी भी पद पर हो।

तीसरा - नदियों के किनारों को अतिक्रमण से बचाना होगा। फ्लडप्लेन नदी की सांस है, लेकिन आज वहां धड़ल्ले से अवैध निर्माण हो रहे हैं। इसे रोकना ज़रूरी है।

साथ ही, जमी हुई गाद हटाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रेजिंग अभियान चलाना होगा, ताकि नदियों का प्राकृतिक बहाव बहाल हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने तो दिशा दिखा दी है। अब ज़िम्मेदारी सरकारों की है कि “राष्ट्रीय संपत्ति” का दर्जा सिर्फ कागज़ी न रहे, बल्कि एक सच्चा संकल्प बने—भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के लिए।

अगर हम आज भी नहीं चेते, तो हम सिर्फ अपनी विरासत नहीं, अपनी जीवनरेखा खो देंगे। यमुना की खामोश पुकार पूरे देश की चेतावनी है—अब वक्त है बहानों को खत्म करने का और नदियों को बचाने का।

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