ऐसी व्यापरीकरण वाली शिक्षा नीति से बनेगा विकसित भारत...

अख़बारों और टेलीविजन के न्यूज़ चैनलों में भारत को विकसित कह देने से देश विकसित नहीं हो जाएगा और जिस तरह से शिक्षा का व्यापरीकरण धड़ल्ले से बढ़ता जा रहा है, ऐसे हालात कहीं नज़र नहीं आ रहे कि भारत जल्द ही विकसित हो सकेगा।
जब देश में शिक्षा के लिए छात्रों को व अभिभावकों को इतना कठिन परिश्रम करना पड़े और स्कूलों व शिक्षा संस्थानों से बार-बार वाद विवाद में उलझना पड़े, वहां कैसे सम्भव है कि देश के छात्र अच्छी शिक्षा पा सकेंगे।
एक रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा का व्यवसाय बॉलीवुड के व्यवसाय से भी ज़्यादा मोटी सालाना कमाई करता है। इसको सरल भाषा में आप ऐसे समझ सकते हैं की हर साल जब भी स्कूल के नए सैशन शुरू होते हैं। स्कूल वाले वर्दी बदल देते हैं। किताबें बदल देते हैं और अभिभावकों को नई वर्दी व नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। कई स्कूलों में तो यह भी देखा गया है कि वह पुरानी कॉपियों, जो इस्तेमाल भी नहीं हुई हो उन तक को इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देते।
अभिभावकों पर जोर दिया जाता है कि वह नई कॉपियां ही खरीदें। उस पर भी एक संकट और कि साल में छात्र यदि में 20 में से 15 ही कॉपियां इस्तेमाल कर पाता है और उसमें से 5 बच जाएं तो वह उन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकता और नए सैशन के लिए स्कूल फिर से 20 नई किताबें ख़रीदने के लिए विवष करेगा। छात्र केवल उतनी ही सामग्री नहीं खरीद सकता जितने कि उसे जरूरत है बल्कि स्कूल वाले यह ज़ोर ज़बरदस्ती करते हैं कि कॉपियों का ही पूरा बंडल ही खरीदा जाए।
अगर स्कूल ऐसी ही मनमानी करते रहेंगे तो वह छात्रों को शिक्षा से दूर एक अंधेरे की ओर धकेलते जाएंगे। क्लास में बच्चों को पेड़ ना काटने व नए पेड़ लगाने की शिक्षा देने वाले स्कूल क्या ये भूल जाते हैं कि है कि उनके इस ज़बरदस्ती किताब, कॉपी बेचने से माता – पिता की जेब पर तो असर पड़ता ही है, वहीं पर्यावरण को भी ख़तरा बढ़ता है।
इस समस्या पर सभी राज्य सरकारों को मुख्यतः केंद्रीय सरकार को ध्यान देना चाहिए और बेहतर शिक्षा नीति के लिए कोशिश करनी चाहिए। उन स्कूलों से तो एक सकारात्मक पहल की उम्मीद की जा सकती है जो सरकार द्वारा आवंटित जमीन पर बने हैं।
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