वैज्ञानिकों ने भारत का अंतरिक्ष इतिहास बदल दिया...


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हैदराबाद के एक निजी भारतीय स्टार्टअप द्वारा पूरी तरह बनाया गया सात मंजिला ऊंचाई वाला रॉकेट श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से आसमान की ओर उड़ गया। आग और धुएं का विशाल गुबार कई किलोमीटर दूर तक दिखाई दे रहा था। करीब 12 मिनट बाद स्काईरूट एयरोस्पेस ने X पर सिर्फ तीन शब्द लिखे।

"Hello Space, We Have Arrived."

इन्हीं तीन शब्दों ने इतिहास लिख दिया।

भारत बन गया दुनिया का तीसरा देश, जहां किसी सरकारी एजेंसी नहीं, बल्कि एक निजी कंपनी ने सफलतापूर्वक अपने पेलोड को कक्षा (ऑर्बिट) में पहुंचाया। इससे पहले यह उपलब्धि केवल अमेरिका और चीन के पास थी।

यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं थी। यह उस नए दौर की शुरुआत थी, जिसकी तैयारी भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वर्षों से कर रहा था। और इस बदलाव को तेज करने का फैसला किया था ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों ने, जिन्होंने सरकारी नौकरी की सुरक्षा छोड़कर एक ऐसे देश में स्टार्टअप शुरू किया, जहां पहले किसी निजी कंपनी ने ऐसा करने की हिम्मत नहीं की थी।

इन दो लोगों ने बदली भारत की अंतरिक्ष कहानी

पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका, दोनों IIT से पढ़े थे और बाद में ISRO में वैज्ञानिक बने। ISRO की बड़ी सफलताओं, अनुशासन और तकनीकी क्षमता को वे अच्छी तरह जानते थे। लेकिन वे यह भी समझते थे कि सरकारी संस्थानों में बड़े मिशन तय प्रक्रिया के अनुसार चलते हैं, इसलिए उनकी गति सीमित होती है।

जून 2018 में दोनों ने ISRO छोड़ दिया और हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की। उनका मानना था कि भारत के बढ़ते अंतरिक्ष कारोबार को ऐसे निजी उद्योग की जरूरत है, जो तेजी से काम करे, कम लागत में रॉकेट बनाए और दुनिया भर में बढ़ रही छोटे सैटेलाइट लॉन्च की मांग को पूरा कर सके।

उसी समय भारत का IN-SPACe ढांचा भी तैयार हो रहा था, जिससे निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे खुलने लगे। दोनों संस्थापकों ने इस मौके को समय रहते पहचान लिया।

ये है पहली बड़ी उड़ान

18 नवंबर 2022 को स्काईरूट ने विक्रम-एस नाम का एक छोटा रॉकेट 'मिशन प्रारंभ' के तहत लॉन्च किया। लगभग 6 मीटर लंबा और 545 किलोग्राम वजनी यह रॉकेट 89.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा।

रॉकेट का नाम डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया था, जिन्हें भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। यह अपने पुराने संस्थान ISRO को सम्मान देने का भी प्रतीक था।

मिशन आगमन: जिसने सब बदल दिया

18 जुलाई 2026 को स्काईरूट का विक्रम-1 रॉकेट अपनी पहली कक्षीय उड़ान 'मिशन आगमन' पर रवाना हुआ।

करीब 22 मीटर ऊंचा, यानी लगभग सात मंजिला इमारत जितना बड़ा यह तीन चरणों वाला रॉकेट 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है।

इसने कई ग्राहकों के पेलोड और वैज्ञानिक प्रयोगों को 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित किया।

यही वह उपलब्धि थी, जिसने देश को निजी अंतरिक्ष लॉन्च क्षमता वाले देशों की सूची में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया।

प्रधानमंत्री का संदेश भी गया अंतरिक्ष

रॉकेट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने हाथ से लिखा "वंदे मातरम्" वाला एक पोस्टकार्ड भी भेजा गया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सफलता देश के युवाओं को बड़े सपने देखने और बिना डर के नए प्रयोग करने की प्रेरणा देगी।

यह पोस्टकार्ड केवल एक प्रतीक नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि स्काईरूट की यह उपलब्धि सिर्फ व्यावसायिक नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।

इस मिशन के पीछे कितना पैसा लगा?

रॉकेट बनाना सिर्फ जुनून से संभव नहीं।

मई 2026 में लॉन्च से कुछ सप्ताह पहले स्काईरूट ने 6 करोड़ डॉलर (60 मिलियन डॉलर) की नई फंडिंग जुटाई।

इस निवेश में Sherpalo Ventures, GIC Singapore, BlackRock और Arkam Ventures जैसे बड़े निवेशकों ने हिस्सा लिया।

इस निवेश के बाद कंपनी की कीमत 1.1 अरब डॉलर पहुंच गई और स्काईरूट भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन गई।

अब तक कंपनी कुल 16 करोड़ डॉलर (160 मिलियन डॉलर) का निवेश जुटा चुकी है।

यह सफलता इतनी बड़ी क्यों है?

दुनिया में छोटे सैटेलाइट लॉन्च की मांग तेजी से बढ़ रही है। अकेले ISRO सभी व्यावसायिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।

अब भारतीय निजी कंपनियां दुनिया भर के ग्राहकों को लॉन्च सेवाएं देने में सक्षम होंगी और SpaceX व चीन की निजी लॉन्च कंपनियों से सीधे मुकाबला कर सकेंगी।

IN-SPACe के बाद शुरू हुए भारत के दर्जनों स्पेस स्टार्टअप्स के लिए भी यह मिशन एक बड़ा संदेश है कि भारत में निजी क्षेत्र भी अंतरिक्ष में बड़ी सफलता हासिल कर सकता है।

2018 में ISRO के दो पूर्व वैज्ञानिकों ने एक छोटा-सा स्टार्टअप शुरू किया था। सिर्फ आठ साल बाद उसी स्टार्टअप का रॉकेट पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया।

स्काईरूट के कमेंटेटर ने कहा था।

"यह भारत के लिए अंतरिक्ष के नए युग की शुरुआत है।"

इस बार यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि सच साबित हुआ।

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