यह कांग्रेस नेता बन सकता है भारत का अगला प्रधानमंत्री?


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भारत की राजनीति में अगर कोई एक नाम है जो एक साथ लेखक, वक्ता, राजनयिक और नेता की पहचान रखता है तो वह है शशि थरूर। ऑक्सफोर्ड की बहस हो या संसद का पटल, थरूर जब बोलते हैं तो लोग सुन चाहते हैं, चाहे उनसे सहमत हों या न हों। उनकी अंग्रेज़ी इतनी समृद्ध है कि एक बार उनके एक शब्द "farrago" को लेकर पूरे देश में शब्दकोश खुल गए थे। लेकिन थरूर सिर्फ भाषा के जादूगर नहीं हैं। वे एक ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र से लेकर भारतीय संसद तक हर मंच पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी है।

Written by Anshita Nagar, Delhi, Published by Deepak Sriram, 2 June 2026, Tuesday, 10:05 PM IST

9 मार्च 1956 को लंदन में जन्मे शशि थरूर का बचपन मुंबई और कोलकाता में बीता, उनके पिता चंद्रन थरूर एक पत्रकार थे तो घर में पढ़ने-लिखने का माहौल शुरू से ही था। थरूर की प्रतिभा बचपन से ही असाधारण थी। मुंबई के कैंपियन स्कूल और दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई के बाद उन्होंने अमेरिका की फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी से पीएचडी की और वह भी केवल बाईस साल की उम्र में।

1978 में वे संयुक्त राष्ट्र से जुड़े और अगले तीन दशकों तक इस संस्था में काम किया। शरणार्थी मामले, शांति स्थापना और संचार विभाग में उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। 2006 में जब संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए चुनाव हुआ तो थरूर उस दौड़ में दूसरे नंबर पर पहुँचे। यह किसी भारतीय के लिए अभूतपूर्व उपलब्धि थी। अंततः दक्षिण कोरिया के बान की-मून उनसे आगे रहे, लेकिन उस चुनाव में थरूर का नाम वैश्विक मंच पर मज़बूती से स्थापित हो गया।

2009 में वे भारतीय राजनीति में केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस के टिकट पर उतरे। पहली ही चुनावी लड़ाई में उन्होंने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। केंद्र में विदेश राज्य मंत्री बने और उस भूमिका में उनका अनुभव काम आया। लेकिन राजनीति में उनका सफर हमेशा आसान नहीं रहा। "ट्विटर कूटनीति" के एक विवाद के कारण उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। पत्नी सुनंदा पुष्कर की दुखद मृत्यु ने उनके व्यक्तिगत जीवन को बहुत कठिन बना दिया। लेकिन हर बार थरूर उठे, संभले और आगे बढ़े।

संसद में उनकी उपस्थिति हमेशा प्रभावशाली रही है। वे उन चुनिंदा सांसदों में हैं जो बहस को तथ्यों और तर्कों से समृद्ध करते हैं। संसदीय स्थायी समितियों में उनके काम को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सराहा है। 2021 में उन्हें "संसद रत्न पुरस्कार" से नवाज़ा गया।

लेखक के रूप में थरूर की पहचान और भी पुरानी है। "The Great Indian Novel", "India: From Midnight to the Millennium", "An Era of Darkness" यह आखिरी किताब ब्रितानी उपनिवेशवाद पर उनका वह तर्क है जो उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनियन में दिया था और जिसका वीडियो दुनियाभर में करोड़ों बार देखा गया। उस भाषण में उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा कि भारत को ब्रिटेन से मुआवज़ा मिलना चाहिए और उनके तर्क इतने मज़बूत थे कि विरोध करना मुश्किल था। उनकी अब तक बीस से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

व्यक्तित्व के लिहाज़ से थरूर उन नेताओं में से हैं जो खुद पर भी हँस लेते हैं। सोशल मंच पर वे सक्रिय हैं, अपने आलोचकों को जवाब देते हैं लेकिन आमतौर पर व्यंग्य और बुद्धिमत्ता के साथ, गुस्से से नहीं। उनकी यह शैली उन्हें भीड़ से अलग करती है।

शशि थरूर भारतीय राजनीति की उस दुर्लभ प्रजाति के प्रतिनिधि हैं जो किताब भी लिखते हैं और लड़ाई भी लड़ते हैं। वे साबित करते हैं कि राजनीति में बौद्धिकता और व्यावहारिकता साथ-साथ चल सकती है। उनसे सहमति हो या असहमति लेकिन यह नकारा नहीं जा सकता कि भारतीय लोकतंत्र को ऐसी आवाज़ों की ज़रूरत है जो सोचकर बोलती हैं।

 

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