हर कुत्ते का दिन आता है — रसोई वाले कुत्ते का कभी नहीं

गैस चूल्हे और बिजली आने से पहले, जब खाना लकड़ी या कोयले की आग पर पकता था, तब एक खास तरह का कुत्ता हुआ करता था। उसका शरीर छोटा था, पैर टेढ़े-मेढ़े और छोटे थे। उसे सिर्फ़ एक ही काम के लिए पाला जाता था—ऐसा काम जो बेहद कठिन, थकाने वाला और बिना किसी सम्मान के था। हैरानी की बात यह है कि इतिहास ने उसके बारे में ज़्यादा कुछ लिखा ही नहीं। इसलिए नहीं कि वह ज़रूरी नहीं था, बल्कि इसलिए कि लोगों को लगा वह याद रखने लायक ही नहीं है।
Read in English: Every Dog Has His Day - Except the One in the Kitchen
उसका नाम था टर्नस्पिट डॉग। उसकी कहानी इंसानों और जानवरों के रिश्ते का शायद सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक है।
जो कोई इंसान नहीं करना चाहता था
टर्नस्पिट डॉग आने से पहले, आग पर भुन रहे मांस को बराबर पकाने के लिए लोहे की सींख (स्पिट) को घंटों तक हाथ से घुमाना पड़ता था। यह काम आमतौर पर रसोई के सबसे छोटे या सबसे निचले दर्जे के नौकर से करवाया जाता था। वह आग की तपिश से बचने के लिए गीले भूसे के पीछे बैठकर लगातार सींख घुमाता रहता था। यह बेहद मुश्किल, थकाऊ और ख़तरनाक काम था।
फिर किसी ने सोचा—यह काम इंसान की जगह कुत्ते से क्यों न करवाया जाए?
वर्ष 1576 की किताब "Of Englishe Dogs" में पहली बार टर्नस्पिट डॉग का ज़िक्र मिलता है। इस कुत्ते को खास तौर पर एक बड़े लकड़ी के पहिए के अंदर दौड़ने के लिए तैयार किया गया था। यह पहिया रसोई की दीवार पर लगा होता था और रस्सियों व पुली की मदद से नीचे लगी मांस वाली सींख से जुड़ा रहता था। जैसे-जैसे कुत्ता पहिए में दौड़ता, सींख घूमती रहती और मांस हर तरफ़ से बराबर पकता।
इसी काम के हिसाब से उसकी पूरी नस्ल तैयार की गई थी—छोटे और टेढ़े पैर, लंबी पीठ, मज़बूत शरीर और घंटों तक लगातार दौड़ने की क्षमता।
मशहूर वैज्ञानिक कार्ल लिनियस ने इस नस्ल का नाम Canis vertigus रखा, जिसका मतलब है "चक्कर खाने वाला कुत्ता"। वहीं चार्ल्स डार्विन ने भी इसे इस बात का उदाहरण बताया कि इंसान अपनी ज़रूरत के हिसाब से जानवरों की नस्लें तैयार कर सकता है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इसकी कीमत उस बेचारे जानवर ने कैसे चुकाई।
पहिए के अंदर ही बीत गई पूरी ज़िंदगी
टर्नस्पिट डॉग की पूरी ज़िंदगी गर्मी, धुएँ, शोर और एक ही काम को बार-बार दोहराने में बीतती थी।
रसोई हमेशा धुएँ और आग से भरी रहती थी, इसलिए उसका पहिया दीवार पर काफी ऊँचाई पर लगाया जाता था ताकि वह ज़्यादा गर्मी से बेहोश न हो जाए। इससे साफ़ पता चलता है कि लोग उसे एक जीव नहीं, बल्कि मशीन की तरह देखते थे—जिसके खराब होने की चिंता तो थी, लेकिन उसके दर्द की नहीं।
काम इतना कठिन था कि ज़्यादातर घरों में ऐसे दो कुत्ते रखे जाते थे। एक दौड़ता था, दूसरा आराम करता था, फिर दोनों बारी बदल लेते थे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अंग्रेज़ी की कहावत "Every dog has his day" (हर किसी का भी एक दिन आता है) शायद यहीं से निकली, क्योंकि हर कुत्ते की पहिए में दौड़ने की अपनी बारी होती थी।
जब कुत्ता थककर धीरे दौड़ने लगता, तो कई रसोइए उसके पहिए में जलता हुआ कोयला फेंक देते थे ताकि डरकर वह फिर तेज़ दौड़ने लगे।
19वीं सदी के एक लेखक ने लिखा था
"ये लंबे शरीर, टेढ़े पैरों और बदसूरत दिखने वाले कुत्ते थे। इनके चेहरे पर हमेशा डर और उदासी दिखाई देती थी, जैसे इन्हें हर पल डर रहता हो कि अब फिर से काम पर लगा दिया जाएगा।"
यह उनके स्वभाव की वजह से नहीं था। यह उस जानवर का चेहरा था, जिसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया गया था।
रविवार को भी आराम नहीं
रविवार को उन्हें काम से छुट्टी मिलती थी, लेकिन वह भी उनके लिए आराम का दिन नहीं होता था।
लोग उन्हें चर्च इसलिए ले जाते थे ताकि ठंडी बेंचों पर बैठते समय उनके पैरों को गर्म रखने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सके।
एक मशहूर घटना इंग्लैंड के बाथ शहर की है। वहाँ एक बिशप अपने प्रवचन में बाइबिल के ईज़ीकिएल और उसके पहिए का ज़िक्र कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने तीसरी बार "पहिया" कहा, चर्च में मौजूद सारे टर्नस्पिट डॉग अचानक उठे और दरवाज़े की ओर भाग गए। शायद उन्हें लगा कि फिर से काम पर बुलाया जा रहा है।
जब Clock Jack मशीन आ गई, तो कुत्ते की ज़रूरत खत्म हो गई
1750 तक टर्नस्पिट डॉग पूरे ब्रिटेन में आम थे।
1850 तक उनकी संख्या बहुत कम हो गई।
1900 आते-आते वे पूरी तरह गायब हो गए।
कारण यह नहीं था कि लोगों को उन पर दया आ गई थी।
असल वजह थी Clock Jack नाम की एक सस्ती मशीन, जो चिमनी की गर्मी से अपने-आप सींख घुमा देती थी। अब वही काम मशीन करने लगी, इसलिए कुत्तों की ज़रूरत ही नहीं रही।
लोग उन्हें पालतू जानवर बनाकर भी नहीं रखना चाहते थे। उन्हें उदास, चिड़चिड़ा और बदसूरत माना जाता था। पीढ़ियों तक कठिन मेहनत ने उनके स्वभाव को भी बदल दिया था। 1850 के बाद अगर किसी के घर ऐसा कुत्ता होता, तो लोग उसे गरीबी की निशानी समझते थे।
धीरे-धीरे उनकी नस्ल की ब्रीडिंग बंद कर दी गई और कुछ ही वर्षों में पूरी नस्ल हमेशा के लिए धरती से खत्म हो गई।
आज दुनिया में टर्नस्पिट डॉग का सिर्फ़ एक संरक्षित नमूना बचा है। उसका नाम व्हिस्की (Whiskey) है। वह वेल्स के एबरगेवेनी म्यूज़ियम में काँच के एक शोकेस में रखा है। आज भी उसका चेहरा ऐसा लगता है, मानो उसे डर हो कि कहीं उससे फिर कोई कठिन काम न करवाया जाए।
यह कहानी हमें क्या सिखाती है?
टर्नस्पिट डॉग की कहानी सिर्फ़ पुराने ज़माने की रसोई का इतिहास नहीं है। यह इंसानों की एक पुरानी आदत का आईना है—जब तक किसी से काम निकलता है, उसका इस्तेमाल करो; और जैसे ही उससे सस्ता या आसान विकल्प मिल जाए, उसे भुला दो।
विडंबना यह है कि 1850 के दशक में न्यूयॉर्क के कुछ होटलों में इन कुत्तों के साथ हो रहे अत्याचार देखकर हेनरी बर्ग इतने दुखी हुए कि उन्होंने आगे चलकर Society for the Prevention of Cruelty to Animals (SPCA) की स्थापना की। यानी जानवरों के अधिकारों की इस बड़ी संस्था की प्रेरणा भी कहीं न कहीं इन्हीं बेबस कुत्तों से जुड़ी थी।
करीब 300 साल तक टर्नस्पिट डॉग ने रसोई की आग जलाए रखी, मांस पकाया और इंसानों की सेवा की। बदले में उसे न सम्मान मिला, न प्यार।
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