कैसे 'नॉर्थ ईस्ट के शिवाजी' लाचित बोरफुकन ने अहोम साम्राज्य को वापस हासिल किया

नॉर्थ ईस्ट का शिवाजी किसे कहा जाता है? लाचित बोरफुकन को नॉर्थ ईस्ट का शिवाजी कहा जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह ही, उन्होंने अपनी शानदार छापामार युद्ध नीति, नदी में लड़ने की तकनीक और अटूट देशभक्ति के दम पर मुगलों की विशाल सेना को हराया व अपनी मातृभूमि की रक्षा की।
भारत का इतिहास महान योद्धाओं भरा हुआ है, लेकिन लाचित बोरफुकन की विरासत अलग चमकती है। 'नॉर्थ ईस्ट के शिवाजी' के रूप में मशहूर, उनकी युद्ध रणनीति और देशभक्ति की कोई बराबरी नहीं कर सकता। इस महान सेनापति ने विदेशी हमलावरों से अहोम साम्राज्य को वापस छीनने की नामुमकिन चुनौती को सच कर दिखाया। सरायघाट के ऐतिहासिक युद्ध में मुगलों की विशाल सेना के सामने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ शानदार जीत हासिल करके, उन्होंने असम को गुलाम होने से बचाया।
इस जीत की अहमियत समझने के लिए हमें 17वीं सदी के उन काले दिनों को देखना होगा। मीर जुमला के नेतृत्व में मुगल साम्राज्य ने असम पर हमला करके उसकी राजधानी पर कब्ज़ा कर लिया था। वहां के राजा को मजबूरी में 'घिलाझारीघाट की संधि' माननी पड़ी, जिससे राज्य का बहुत सारा धन और गुवाहाटी जैसे अहम हिस्से उनके हाथ से निकल गए। इस हार से असम के लोगों के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुंची। राजा चक्रध्वज सिंघा अपने साम्राज्य का खोया हुआ गौरव वापस पाने के लिए दृढ़ थे। उन्हें पता था कि इतने बड़े दुश्मन को हराने के लिए एक शानदार व वफादार नेता की जरूरत है। इसलिए उन्होंने इस आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करने के लिए एक दूरदर्शी सेनापति को चुना और उन्हें जिम्मेदारी के प्रतीक के तौर पर सोने की मूठ वाली तलवार भेंट की।
असम के कब्ज़े वाले हिस्से को कैसे आज़ाद कराया गया?
सबसे पहले 1667 में रात के अंधेरे में किए गए एक अचानक हमले से गुवाहाटी को आज़ाद कराया गया। बाद में, वापस जीते गए इस इलाके की रक्षा के लिए दुश्मनों को नदी के संकरे रास्तों में लड़ने पर मजबूर किया गया, जिससे मुगलों की बड़ी जमीनी सेना किसी काम की नहीं रही।
कब्ज़े वाले इलाकों को आज़ाद कराने का यह अभियान बहुत तेज़ी व सूझबूझ के साथ शुरू हुआ। 1667 में, नए सेनापति ने रात के अंधेरे में एक साहसिक हमला किया। छुपकर और वहां के भूगोल की अच्छी समझ का फायदा उठाते हुए, असम की सेना ने किलों की दीवारें पार कीं, दुश्मनों को खदेड़ दिया और गुवाहाटी को वापस जीत लिया। अपनी इस बेइज़्ज़ती से आगबबूला होकर, मुगल सम्राट ने अनुभवी विशाल सेना भेज दी। यह हमलावर सेना बहुत खूंखार थी, जिसमें हज़ारों पैदल सैनिक, एक बड़ी घुड़सवार सेना और भारी हथियारों से लैस समुद्री बेड़ा शामिल था।
यह जानते हुए कि खुले मैदान में इतने बड़े दुश्मन से लड़ना सुसाइड करने जैसा होगा, इस समझदार असमिया रणनीतिकार ने वहां के प्राकृतिक माहौल का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उसने दुश्मन को ब्रह्मपुत्र नदी के संकरे और पेचीदा रास्तों में फंसा लिया, जहां मुगलों के बड़े जहाज आसानी से हिल-डुल नहीं सकते थे। छापामार युद्ध का सहारा लेते हुए, उसने रातों-रात मिट्टी के बड़े-बड़े बांध बनवाए ताकि ज़मीन के रास्ते को बंद किया जा सके और दुश्मन थक कर पस्त हो जाए। मातृभूमि के प्रति उनका समर्पण इतना पक्का था कि जब मिट्टी के इन बांधों को बनाने में उनके अपने मामा ने लापरवाही की, तो उन्होंने अपने मामा का सिर कलम कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि "देश से बढ़कर कोई रिश्तेदार नहीं होता," जो आज भी लीडरशिप की एक मिसाल है।
सरायघाट का युद्ध क्यों महत्वपूर्ण है?
यह ऐतिहासिक युद्ध इसलिए बहुत अहम है क्योंकि इसने नॉर्थ ईस्ट इंडिया में मुगलों के विस्तार को हमेशा के लिए रोक दिया। इसकी वजह से पीढ़ियों तक इस इलाके की सांस्कृतिक पहचान, संप्रभुता और आज़ादी सुरक्षित रही।
यह भयंकर युद्ध 1671 में अपने चरम पर पहुंच गया। गंभीर रूप से बीमार व बिस्तर पर पड़े होने के बावजूद, सेनापति ने देखा कि उनकी नौसेना दुश्मन की भारी गोलाबारी के आगे कमज़ोर पड़ रही है। हार मानने के बजाय, उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उन्हें उठाकर सीधे एक युद्ध-नौका पर ले जाएं और दुश्मनों की ओर हमला बोल दें। अपने बीमार नेता को देश के लिए सब कुछ दांव पर लगाते देख, पीछे हट रहे असमिया सैनिक एक नए जोश और गुस्से के साथ आगे बढ़े। बहादुरी के इस बेमिसाल नज़ारे ने मुगल सेना का मनोबल पूरी तरह तोड़ दिया और असम को एक ऐतिहासिक जीत मिली।
इस महान योद्धा की यह शानदार कहानी अब केवल एक इलाके तक सीमित न रहकर पूरी दुनिया के सामने आने वाली है। इस समय एक बड़ी पैन-इंडिया फिल्म पर काम चल रहा है, और उम्मीद है कि मशहूर फिल्म मेकर आदित्य धर इस ऐतिहासिक कहानी को बड़े पर्दे पर लाएंगे। इससे पहले भी कई देशभक्ति वाली ब्लॉकबस्टर फिल्में बना चुके आदित्य धर के जुड़ने से अहोम साम्राज्य की इस लड़ाई के अमर होने की पूरी उम्मीद है। ऐतिहासिक नायकों पर बन रहे ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स से यह तय होगा कि आज की पीढ़ी भी उस महान सेनापति के बारे में जाने जिसने एक बड़े साम्राज्य को आगे बढ़ने से रोक दिया था।
संक्षेप में कहें तो लाचित बोरफुकन की यह ऐतिहासिक कहानी आज भी मातृभूमि के लिए प्यार और संघर्ष का एक जीता-जागता प्रतीक है। 'नॉर्थ ईस्ट के शिवाजी' के रूप में, अपनी ज़मीन का सही इस्तेमाल करके व अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर अहोम साम्राज्य को वापस पाने के उनके तरीके ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। सरायघाट के युद्ध में मिली यह चमत्कारी जीत हमेशा याद दिलाती है कि एक शानदार रणनीति और अटूट समर्पण के सामने बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी घुटने टेक देती हैं। आज उनकी यह विरासत न सिर्फ हमारी सेना को प्रेरणा देती है, बल्कि पूरे देश का दिल जीतने के लिए भी तैयार है।
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