एक ही जीत, अलग-अलग हेडलाइन: भारत की कामयाबी पर पश्चिमी मीडिया की दोगली सोच…


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भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया की सोच समझना हो तो बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। बस यह जान लीजिए कि भारत कुछ बड़ा हासिल करे तो खबर कैसे लिखी जाती है। उपलब्धि वही, लेकिन हेडलाइन ऐसी जैसे भारत ने कामयाबी नहीं, कोई गलती कर दी हो।

हिंदुस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम हो, ग्लोबल रैंकिंग में उसकी स्थिति हो या अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई बड़ी उपलब्धि—कई बार खबर में उपलब्धि से ज्यादा उसकी गरीबी, समस्याएं और कमियां दिखाई देने लगती हैं। चंद्रयान-3 की कवरेज इसका एक चर्चित उदाहरण है।

Read in English: Same Win, Different Headline: How Western Media Frames India’s Success

चांद पर पहुंचा हिंदुस्तान, लेकिन चर्चा गरीबी की होने लगी

23 अगस्त 2023 को जब भारत ने चंद्रयान-3 के जरिए चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल लैंडिंग की। भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना। ISRO की यह उपलब्धि अमेरिका, रूस और चीन जैसी अंतरिक्ष शक्तियों की कतार में भारत की बड़ी मौजूदगी का संकेत थी। लेकिन खबरों का अंदाज हर जगह एक जैसा नहीं था।

जबकि पाकिस्तान के कई मीडिया संस्थानों ने भी इस उपलब्धि को प्रमुखता से दिखाया। यहां तक कि पाकिस्तान के एक पूर्व मंत्री ने भी ISRO की सफलता को शानदार पल बताया।

वहीं, ब्रिटिश मीडिया के कुछ हिस्सों में सवाल कुछ और ही था—"भारत इतना पैसा अंतरिक्ष पर क्यों खर्च कर रहा है, जबकि यहां गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की समस्या है?"

मतलब भारत चांद पर पहुंच गया, लेकिन सवाल फिर वही—"सड़क कैसी है?"

GB News के एक एंकर ने तो यहां तक सुझाव दे दिया कि भारत को ब्रिटेन से मिली विदेशी सहायता वापस कर देनी चाहिए।

यानी उपलब्धि पर बधाई देने के बजाय संदेश कुछ ऐसा था—"चांद पर पहुंच गए हो? पहले हमारा हिसाब चुकाओ!"

मामला सिर्फ चंद्रयान-3 का नहीं है

आपको लगता है कि यह सिर्फ 2023 का मामला था, तो कहानी थोड़ी पुरानी है।

2014 में भारत का मंगलयान पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा में पहुंच गया। भारत ऐसा करने वाला पहला एशियाई देश बन गया।

बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि थी। लेकिन Reuters की रिपोर्ट में भी इस उपलब्धि के साथ यह बात जोड़ दी गई कि भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान पर खर्च करने के लिए आलोचना झेलनी पड़ती है, जबकि देश में लाखों लोग भूखे हैं।

कुछ पश्चिमी लेखों में तो मंगल मिशन की खबर के साथ भारत की "भयंकर गरीबी" को ही प्रमुखता मिल गई।

अब जरा कल्पना कीजिए—अगर NASA का मिशन सफल हो और खबर की हेडलाइन हो:

NASA की बड़ी कामयाबी, लेकिन अमेरिका में बेघर लोग क्यों?"

इससे भी पहले, 2008 में जब चंद्रयान-1 सफलतापूर्वक चांद की कक्षा में पहुंचा, Fox News की एक हेडलाइन का अंदाज कुछ ऐसा था मानो सवाल यह हो कि "भारत के पास आखिर इतनी एयरोस्पेस विशेषज्ञता आई कहां से?"

उपलब्धि देखकर प्रभावित होने के बजाय थोड़ा आश्चर्य भी—"अच्छा! भारत ये भी कर सकता है?"

जब खबर से आगे बढ़कर जलन शुरू हो जाए

कभी-कभी मामला सिर्फ गरीबी याद दिलाने तक सीमित नहीं रहता।

चंद्रयान-3 की सफलता के बाद Financial Times में एक कार्टून प्रकाशित हुआ, जिसमें भारतीय ऑटो-रिक्शा को चांद की सतह पर दिखाया गया। इसे कई लोगों ने भारत की वैज्ञानिक उपलब्धि को एक पुराने और घिसे-पिटे स्टीरियोटाइप में बदलने वाला मजाक बताया।

2014 के मंगलयान मिशन के बाद New York Times के एक विवादित कार्टून को लेकर भी इसी तरह की आलोचना हुई थी।

सवाल यह है कि जब अमेरिका, रूस या यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियां बड़ी उपलब्धियां हासिल करती हैं, तो क्या उनकी वैज्ञानिक सफलता को भी इसी तरह कार्टून और रूढ़ छवियों में समेट दिया जाता है?

या फिर भारत के लिए नियम थोड़े अलग हैं?

दूसरे देशों की कामयाबी में गरीबी कहां गायब हो जाती है?

यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है।

रूस के मीडिया ने मंगलयान की सफलता को काफी सीधे और उत्साह के साथ कवर किया। वहां हर बार यह जोड़ना जरूरी नहीं समझा गया कि भारत में गरीबी कितनी है या सड़कें कैसी हैं।

आलोचकों का तर्क भी सीधा है।

हम आमतौर पर ऐसी हेडलाइन नहीं देखते:

"इंग्लैंड ने ओलंपिक गोल्ड जीता, लेकिन देश में हाउसिंग क्राइसिस जारी।"

या:

"NASA ने नया मिशन लॉन्च किया, जबकि अमेरिका में तूफान राहत व्यवस्था पर सवाल।"

वहीं भारत की उपलब्धि हो तो उसके साथ अक्सर एक छोटा-सा "लेकिन..." जरूर दिखाई देता है।

मानो भारत को सफलता हासिल करने की अनुमति तो है, मगर उसके साथ फुटनोट लगाना भी जरूरी है।

ऐसा क्यों होता है?

इसके पीछे कई संभावित वजहें हो सकती हैं।

वहीं कुछ मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे औपनिवेशिक दौर की पुरानी सोच का असर हो सकता है। यानी जिस देश को कभी गरीब और पिछड़ा समझा गया था, उसका अंतरिक्ष, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ना कुछ लोगों को सहज नहीं लगता।

दूसरी वजह

भारत में गरीबी, असमानता और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं वास्तव में मौजूद हैं। इसलिए पत्रकार कई बार इन्हें खबर के संदर्भ के तौर पर जोड़ देते हैं—भले ही उस खास खबर में उनकी जरूरत हो या न हो और यह भी जरूरी है कि पूरे पश्चिमी मीडिया को एक ही रंग में रंग देना सही नहीं होगा।

ब्रिटेन के Telegraph जैसे कई मीडिया संस्थानों ने भारत के मंगलयान और चंद्रयान-3 की सफलता को सकारात्मक और उत्सव वाले अंदाज में भी कवर किया है।

इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि हर पश्चिमी पत्रकार या हर पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत के खिलाफ है।

फिर पाठकों को क्या समझना चाहिए?

मुद्दा यह नहीं है कि भारत की आलोचना नहीं होनी चाहिए।

बिल्कुल होनी चाहिए।

गरीबी हो, बेरोजगारी हो, असमानता हो, बुनियादी सुविधाओं की कमी हो—इन मुद्दों पर सवाल उठाना पत्रकारिता का जरूरी हिस्सा है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हर भारतीय उपलब्धि के साथ वही पुराना "लेकिन भारत गरीब है..." जोड़ना जरूरी है?

अगर किसी देश की अंतरिक्ष उपलब्धि की खबर है, तो पहले उपलब्धि को उपलब्धि की तरह देखिए।

फिर जरूरत हो तो उसकी कमियों पर अलग सवाल पूछिए।

क्योंकि किसी देश का विकास बिल्कुल ऐसा नहीं होता कि वह पहले अपनी सारी समस्याएं खत्म करे और उसके बाद ही चांद पर जाए।

भारत देश एक साथ कई चुनौतियों से जूझ सकता है और साथ ही बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियां भी हासिल कर सकता है।

इसलिए अगली बार जब भारत की कोई बड़ी उपलब्धि हेडलाइन बने और उसके साथ अचानक गरीबी, सड़क, भूख और विदेशी सहायता की पूरी फाइल खोल दी जाए, तो एक सवाल जरूर पूछिए

"अगर यही उपलब्धि किसी और देश ने हासिल की होती, तो क्या हेडलाइन भी ऐसी ही होती?"

यही सवाल शायद पूरी कहानी समझने के लिए काफी है।

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