बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के बाद भी क्यों पीछे भक्ति फिल्में? 'जय संतोषी मां' से 'हनुमान अंश' तक का सफर


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भारतीय सिनेमा में भक्ति फिल्मों का इतिहास बेहद स्वर्णिम रहा है मगर आज के दौर में बंपर बॉक्स ऑफिस कलेक्शन देने के बावजूद ये फिल्में मुख्यधारा की कमर्शियल फिल्मों से कुछ पीछे छूट गई हैं। साल 1975 में रिलीज हुई 'Jai Santoshi Maa' movie इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसका कलेक्शन आज भी फिल्म पंडितों को हैरान करता है। आज के दौर में 'Hanuman Ansh' जैसी फिल्मों ने इस जॉनर को पुनर्जीवित करने की कोशिश की है। भक्ति फिल्मों का पीछे छूटने का मुख्य कारण बदलते दर्शक वर्ग, वीएफएक्स की बढ़ती मांग और सिनेमा में पौराणिक कथाओं के बजाय एक्शन को ज्यादा तरजीह देना रहा है। फिर भी जब आस्था और सिनेमा का सही तालमेल होता है  तो बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड टूट जाते हैं।

Written by Deepak H Sriram (Editor NBP)

Read in English: Why Do Devotional Films Lag Behind Despite Bumper Box Office Collections? From 'Jai Santoshi Maa' to 'Hanuman Ansh'

'जय संतोषी मां' का बजट और ऐतिहासिक कलेक्शन

भक्ति फिल्मों के स्वर्ण युग की बात करें, तो 1975 में आई 'जय संतोषी मां' एक मील का पत्थर है। केवल 2.5 लाख रुपये के बेहद सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने उस दौर में लगभग 5 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया था। यह वह साल था जब 'शोले' और 'दीवार' जैसी फिल्में रिलीज हुई थीं लेकिन सिनेमाघरों के बाहर दर्शक जूते उतारकर 'जय संतोषी मां' देखने जाते थे। कम बजट के बावजूद इसकी कहानी भजन व भावनाओं ने इसे ब्लॉकबस्टर बना दिया।

'हनुमान अंश' और 'धुरंधर' की तुलना

आधुनिक तकनीक के साथ जब भक्ति और पौराणिक कहानियों को पर्दे पर उतारा जाता है तो दर्शकों का नजरिया बदल जाता है। 'हनुमान अंश' इसी श्रेणी की एक फिल्म है जिसकी तुलना 'धुरंधर' जैसी एक्शन फिल्मों से की जा रही है। जहां 'धुरंधर' पूरी तरह से मसाला एक्शन और स्टार पावर पर निर्भर करती है, वहीं 'हनुमान अंश' भारतीय जड़ों और सांस्कृतिक आस्था पर आधारित है। फिल्म समीक्षक मोनिका शर्मा (Monika Sharma) ने 'हनुमान अंश' को प्रमोट करते हुए विशेष रूप से इसके विजुअल इफेक्ट्स और आध्यात्मिक गहराई की तारीफ की। मोनिका के रिव्यू ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव है, जो इसे किसी भी साधारण कमर्शियल फिल्म से ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।

भारत के महान संत और उनकी आध्यात्मिक विरासत

भारतीय आध्यात्मिक चेतना को फिल्मों के साथ-साथ यहां के महान संतों ने भी वैश्विक स्तर पर पहुंचाया है। देवराहा बाबा, श्रील प्रभुपाद और परमहंस योगानंद जैसे महायोगियों का जीवन अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है

देवराहा बाबा (Devraha Baba): वृंदावन और मथुरा के पास यमुना किनारे मचान पर रहने वाले देवराहा बाबा को एक 'अघोर' और रहस्यमयी संत माना जाता था। उनकी आयु को लेकर कई किंवदंतियां हैं; कुछ लोग उन्हें सैकड़ों साल का मानते थे। वे कभी जमीन पर पैर नहीं रखते थे और मचान से ही लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे।

देवराहा बाबा से संबंधित किताब: 'देवराहा बाबा: एक रहस्य' (Devraha Baba: Ek Rahasya) जैसी कई संकलित पुस्तकों में उनके चमत्कारों और उपदेशों का वर्णन मिलता है।

श्रील प्रभुपाद (Srila Prabhupada): अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 69 वर्ष की आयु में अमेरिका जाकर इस्कॉन (ISKCON - International Society for Krishna Consciousness) की स्थापना की। उन्होंने पश्चिमी दुनिया को हरे कृष्ण महामंत्र और भगवद गीता के वास्तविक अर्थ से परिचित कराया।

संबंधित किताब: 'भगवद गीता यथारूप' (Bhagavad Gita As It Is)। यह उनके द्वारा किया गया गीता का सबसे प्रामाणिक अनुवाद और व्याख्या है, जिसका दर्जनों भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

परमहंस योगानंद (Paramahansa Yogananda): 20वीं सदी में पश्चिमी देशों में क्रिया योग (Kriya Yoga) और ध्यान की शिक्षा देने वाले वे पहले प्रमुख भारतीय संत थे। उन्होंने धर्म और विज्ञान के बीच एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया।

संबंधित किताब: 'योगी की आत्मकथा' (Autobiography of a Yogi) दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली आध्यात्मिक किताबों में से एक है, जिसने स्टीव जॉब्स से लेकर जॉर्ज हैरिसन तक को प्रभावित किया।

अंततः चाहे वह 70 के दशक की 'Jai Santoshi Maa' movie हो या आज के समय की 'Hanuman Ansh', भारतीय दर्शकों के मन में आध्यात्म के लिए हमेशा एक विशेष स्थान रहा है। अगर निर्माता मजबूत कहानी और सही तकनीक के साथ पर्दे पर उतरें तो आज भी भक्ति फिल्में बॉलीवुड और हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों को टक्कर देते हुए कलेक्शन कर सकती हैं और वैश्विक पटल पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत कर सकती हैं।

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