गांव की टूटी सड़क से बदली सोच: अब बाहर से नहीं अपने ही इलाके की मिट्टी और पत्थरों से बन रही हैं ग्रामीण सड़कें...


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हरियाणा के एक छोटे से गांव में रहने वाले 55 वर्षीय किसान राम सिंह को आज भी वह समय याद है जब बरसात शुरू होते ही गांव की सड़क कीचड़ में बदल जाती थी। ट्रैक्टर खेत तक ले जाना मुश्किल हो जाता था और बच्चों को स्कूल पहुंचने में दिक्कत होती थी। हर दो-तीन साल में सड़क की मरम्मत होती थी लेकिन कुछ महीनों बाद वही हालत फिर सामने आ जाती।

Written and published by Deepak SriRam, Delhi, 6 June, 2026, Saturday, 2:05 AM IST

गांव वालों को लगता था कि सड़क की समस्या का समाधान केवल ज्यादा बजट से ही हो सकता है। लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि असली समस्या बजट नहीं, बल्कि सड़क बनाने के तरीके में छिपी थी।

दरअसल, सड़क निर्माण के लिए ज्यादातर सामग्री दूसरे जिलों से मंगाई जाती थी, जबकि गांव के आसपास मौजूद पत्थर, मिट्टी और खदानों से निकलने वाला अवशेष पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा था। यही सोच आज देश के कई ग्रामीण इलाकों में बदल रही है।

स्थानीय सामग्री से सड़क निर्माण क्यों चर्चा में है?

भारत में हर साल हजारों किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण होता है। इन परियोजनाओं में बड़ी मात्रा में गिट्टी, मिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री का उपयोग किया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कई क्षेत्रों में स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करके सड़क निर्माण की लागत कम की जा सकती है और पर्यावरणीय नुकसान भी घटाया जा सकता है।

पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय पत्थर, खदानों से निकलने वाला अवशेष, तालाबों की खुदाई से निकली मिट्टी और कुछ जगहों पर कृषि अपशिष्ट तक सड़क की आधार परत बनाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

इससे दोहरा फायदा हो सकता है। एक तरफ निर्माण सामग्री को दूर-दराज से लाने की जरूरत कम पड़ती है। दूसरी तरफ स्थानीय संसाधनों का उपयोग बढ़ता है।

गांव के लोगों को क्या फायदा?

ग्रामीण सड़क निर्माण में स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल केवल तकनीकी बदलाव नहीं है बल्कि यह गांव की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा मुद्दा है।

जब निर्माण सामग्री स्थानीय स्तर पर जुटाई जाती है तो ट्रांसपोर्ट पर होने वाला खर्च कम होता है। कई बार खुदाई, छंटाई और ढुलाई का काम गांव के लोगों को ही मिल जाता है। इससे स्थानीय रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों के कई इलाकों में खदानों के आसपास बड़ी मात्रा में पत्थर का अवशेष जमा रहता है। यह सामग्री वर्षों तक बेकार पड़ी रहती है। यदि इसका वैज्ञानिक परीक्षण कर सड़क निर्माण में उपयोग किया जाए तो एक तरफ कचरा कम होगा और दूसरी तरफ सड़क निर्माण की लागत में कमी आ सकती है।

पर्यावरण पर भी पड़ेगा असर

आज सड़क निर्माण को केवल विकास का प्रतीक माना जाता है लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभावों पर कम ही चर्चा होती है।

सड़क बनाने के लिए सामग्री जब सैकड़ों किलोमीटर दूर से लाई जाती है तो भारी ट्रकों की आवाजाही बढ़ती है। इससे ईंधन की खपत व कार्बन उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं।

स्थानीय सामग्री आधारित सड़क निर्माण मॉडल इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सड़क परियोजनाओं की योजना स्थानीय संसाधनों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो ग्रामीण बुनियादी ढांचे को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।

सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

हालांकि यह मॉडल सुनने में आसान लगता है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं।

हर इलाके की मिट्टी और पत्थर की गुणवत्ता अलग होती है। इसलिए किसी भी सामग्री का उपयोग करने से पहले उसका तकनीकी परीक्षण जरूरी है। कई बार स्थानीय अधिकारियों और ठेकेदारों के पास ऐसी परियोजनाओं को लागू करने का अनुभव भी नहीं होता।

इसके अलावा, सड़क निर्माण में वर्षों से एक तय प्रक्रिया अपनाई जाती रही है। नई सोच और स्थानीय प्रयोगों को स्वीकार करने में समय लग सकता है।

भविष्य की सड़कें कैसी होंगी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले सालों में ग्रामीण सड़क निर्माण केवल डामर और सीमेंट तक सीमित नहीं रहेगा। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती निर्माण लागत और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण स्थानीय संसाधनों पर आधारित मॉडल की मांग बढ़ सकती है।

कई गांवों में अब यह सवाल उठने लगा है कि जब सड़क उसी गांव के लिए बन रही है, तो उसकी सामग्री भी उसी इलाके से क्यों नहीं आ सकती?

राम सिंह जैसे किसानों के लिए यह केवल सड़क का मामला नहीं है। यह उस सोच का बदलाव है जिसमें विकास व स्थानीय संसाधनों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि साझेदार माना जा रहा है।

शायद भविष्य की सबसे मजबूत सड़कें वे होंगी जो केवल गांवों को शहरों से नहीं जोड़ेंगी, बल्कि विकास को स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से भी जोड़ेंगी।

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