रणघोष

शहीदों की हड्डी बोलती है, इस मिट्टी के कण-कण में,
फिर काहे गद्दारी गूंजे, इसी धरती के आंगन में?
सैनिकों का लहू बहा है, हर चौकी हर सिल पर यहाँ,
फिर कैसे गूंजे वो नारे, जो देश को नीलाम करें यहाँ?
जिस राम के मर्यादा-पथ पर, चली सदियों सभ्यता हमारी,
उसी राम पर व्यंग्य करो तुम, ये कैसी विचारधारा तुम्हारी?
पुरखों की थाती रौंद रहे हो, अपने ही पैरों तले,
फिर भी कहते हो प्रगतिशील हो, झूठ के इस मेले में पले।
छात्रों के मासूम कंधों पर, बंदूक धरे सियासतबाज़,
ख़ुद छिपकर बैठे पर्दे पीछे, बच्चों को दिया आतिशबाज़।
जिन हाथों में क़लम सजे थे, उनमें पत्थर थमा दिए,
जिस उम्र में सपने बुनने थे, उस उम्र को जला दिए।
फ़ौज के जांबाज़ों को कोसो, सरहद का दर्द नहीं जानते,
जिस चादर तले चैन से सोए, उसी चादर को तार-तार करते।
याद रखो ये पावन धरती, कायरों की मोहताज नहीं,
जो घर में आग लगाए ख़ुद ही, उसका कोई इलाज नहीं।
अब चुप्पी की उम्र गई है, अब हर आवाज़ जवाब देगी,
राष्ट्र-विरोधी हर साज़िश का, जनता खुद हिसाब लेगी।
यह सरहद, यह मंदिर, यह मिट्टी, तीनों की एक ही जान है,
जो इस पर आंच भी लाए, समझो अब उसकी पहचान है।