छात्रों का आंदोलन भ्रष्ट नेताओं ने हाईजैक कर लिया…

भारत में कहीं न कहीं कोटा, पटना या सीकर के किसी छोटे से कमरे में 19 साल की एक छात्रा बैठी होगी। उसके चारों ओर जीवविज्ञान की किताबें और हाथ से लिखे नोट्स बिखरे होंगे। उसने लगातार तीन साल तक मेहनत की। उसके माता-पिता ने चुपचाप अपने खर्च कम किए, लेकिन कभी उसे इसका एहसास नहीं होने दिया। उसने शादियाँ, त्योहार और दोस्तों के साथ बिताए जाने वाले अनगिनत पल छोड़ दिए, क्योंकि उसे भरोसा था कि अगर वह ईमानदारी से मेहनत करेगी तो परीक्षा निष्पक्ष होगी।
लेकिन उसका यह भरोसा टूट गया। और जिन लोगों ने उसके लिए लड़ने का वादा किया था, उन्होंने भी धीरे-धीरे उसके मुद्दे को छात्रों से हटाकर अपनी राजनीति का विषय बना दिया।
समझना ज़रूरी है कि यह पूरा मामला शुरू कहाँ से हुआ।
NEET 2026 की परीक्षा 3 मई को हुई थी। 7 मई तक राजस्थान पुलिस को सीकर में एक तथाकथित "गेस पेपर" मिलने की सूचना मिली। इस पेपर में 410 प्रश्न थे, जिनमें से 120 प्रश्न असली परीक्षा से हूबहू मेल खाते थे और उनके उत्तर विकल्प भी बिल्कुल एक जैसे थे। 12 मई को CBI ने इस मामले में केस दर्ज किया।
यानी 180 में से 120 प्रश्न पहले ही लीक हो चुके थे। यह कोई अफवाह या आरोप नहीं था, बल्कि जांच का विषय बना वास्तविक मामला था। जिन लोगों ने पैसे देकर यह पेपर पहले ही हासिल कर लिया था, उन्हें परीक्षा शुरू होने से पहले ही अनुचित बढ़त मिल गई। करोड़ों छात्रों की वर्षों की मेहनत पर सवाल खड़े हो गए।
इसी कारण छात्रों में गुस्सा था और उनका विरोध पूरी तरह जायज़ था। वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर लाल शर्मा के अनुसार यह आंदोलन पूरी तरह छात्रों का था। जिन युवाओं का भविष्य एक टूटी हुई परीक्षा व्यवस्था की वजह से प्रभावित हुआ, उन्हें जवाब मांगने और शांतिपूर्ण विरोध करने का पूरा अधिकार था।
फिर आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा।
19 और 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर की तस्वीरें देखने पर सवाल उठता है कि वहाँ मौजूद लोगों में वास्तव में कितने NEET छात्र थे?
विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन में पहुँचने लगे। कई विपक्षी नेताओं ने धरना दिया और मंच साझा किया। धीरे-धीरे छात्रों की आवाज़ के साथ राजनीतिक भाषण, नारे और दलगत बयान प्रमुख होने लगे।
इसी दौरान कुछ वीडियो सामने आए जिनमें ऐसे लोग भी दिखाई दिए जिनका NEET परीक्षा से कोई सीधा संबंध नहीं था। कुछ स्थानों पर हिंसा, पथराव और पुलिसकर्मियों पर हमले की घटनाएँ भी सामने आईं। कई पुलिसकर्मी घायल हुए तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा।
ऐसे घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया था?
वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर लाल शर्मा का कहना है कि यदि यह आंदोलन वास्तव में केवल छात्रों के हित के लिए था, तो फिर विभिन्न राज्यों में हुए अन्य पेपर लीक मामलों पर समान रूप से चर्चा क्यों नहीं हुई? उनका तर्क है कि परीक्षा व्यवस्था की समस्याएँ किसी एक राज्य या एक सरकार तक सीमित नहीं हैं। अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग सरकारों के दौरान भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। इसलिए समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार होना चाहिए।
प्रदर्शन के दौरान ऐसे नारे भी सुनाई दिए जिनका सीधा संबंध परीक्षा सुधार से नहीं था। जब कुछ प्रदर्शनकारियों से पूछा गया कि पेपर लीक रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, तो कई लोग इसका स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाए। इससे यह बहस और तेज हुई कि आंदोलन का केंद्र छात्रों की समस्या रही या राजनीतिक मांगें।
पूरे विवाद से सबसे महत्वपूर्ण बात यही निकलकर सामने आती है कि यदि किसी छात्र आंदोलन का उद्देश्य छात्रों के भविष्य की रक्षा है, तो उसका केंद्र भी वही रहना चाहिए। जब किसी आंदोलन में राजनीतिक हित हावी होने लगते हैं, तब सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं छात्रों का होता है जिनके नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था।
NEET संकट केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है। यह वर्षों से चली आ रही परीक्षा प्रणाली की कमियों का परिणाम है। इसका स्थायी समाधान स्वतंत्र और पारदर्शी परीक्षा संस्थाएँ, मजबूत तकनीकी सुरक्षा, प्रश्नपत्र तैयार करने की सुरक्षित व्यवस्था और सभी राज्यों में समान जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
कोटा के उस छोटे से कमरे में बैठी छात्रा केवल निष्पक्ष परीक्षा और न्याय चाहती है। उसकी वर्षों की मेहनत किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
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