अहंकारी सरकार - पहले ही रोक सकती थी नुकसान…


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छात्रों को सामने रखकर समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव, कांग्रेस के राहुल गांधी, सीजेपी, कुणाल कामरा, विजेता दहिया और कश्मीर को देश से अलग बताने वाली अरुंधति रॉय जैसे कई लोगों ने नीट के असली मुद्दे पर बात न करके आंदोलन को हाईजैक कर छात्र आंदोलन को कमजोर किया।

किसी भी लोकतंत्र में आंदोलन होना सामान्य बात है। छात्र अपने भविष्य, परीक्षाओं, रोजगार या शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर आवाज़ उठाते हैं। सरकार का भी यह दायित्व होता है कि वह समय रहते उनकी बात सुने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश करे। यदि शुरुआत में ही संवेदनशीलता के साथ संवाद हो जाता, तो शायद हालात इतने नहीं बिगड़ते। देश की संपत्ति का नुकसान नहीं होता, छात्र घायल नहीं होते और पुलिसकर्मियों को भी चोटें नहीं झेलनी पड़तीं। लोकतंत्र में टकराव से बेहतर रास्ता बातचीत का ही होता है।

छात्रों को भड़काने वाले नेता

जब कुछ राजनीतिक या फ़िल्मी हस्तियां छात्रों की भावनाओं का इस्तेमाल अपने विचारों या राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करने लगती हैं। ऐसे समय में छात्रों का असली मुद्दा पीछे छूट जाता है और बहस दूसरी दिशा में चली जाती है।

सीजेपी आंदोलन में ऐसे कई नाम सामने आए, जिनमें उमर खालिद के समर्थन की बातें करने वाले लोग, कुणाल कामरा, विजेता दहिया, अरुंधति रॉय तथा कुछ अन्य सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणीकार शामिल रहे। जिन्होंने श्रीराम पर, प्रेमानंद महाराज पर टिप्पणी की और भड़काऊ बातें जैसे आरएसएस का विरोध करना, ब्राह्मण समाज के खिलाफ बयान देना या कश्मीर पर विवादित विचार वाले मुद्दे उछाले जिनसे छात्रों की मांगों का कोई संबंध नहीं था। इन विषयों के कारण आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया।

छात्रों का असली मुद्दा छीन लेना

जब कोई आंदोलन शुरू होता है, तो उसका एक स्पष्ट उद्देश्य होता है। यदि छात्र शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, तो चर्चा उसी विषय पर होनी चाहिए।

नीट पेपर लीक जैसे गंभीर मामले में उन छात्रों और परिवारों की पीड़ा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिनका भविष्य प्रभावित हुआ या जिन्होंने मानसिक दबाव में अपनी जान तक गंवा दी। आंदोलन का केंद्र परीक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए था, लेकिन बहस कई अन्य राजनीतिक मुद्दों में उलझती चली गई। इससे छात्रों की वास्तविक मांगें कमजोर पड़ गईं।

नुकसान किसका हुआ

आखिर में सबसे बड़ा नुकसान किसे उठाना पड़ा?

चोट छात्रों को लगी। चोट सुरक्षा कर्मियों को भी लगी। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। कई जगह आगजनी हुई और सरकारी संसाधनों को क्षति पहुंची। इन सबका बोझ अंततः देश के हर करदाता पर पड़ता है। सार्वजनिक बसें, सड़कें, सरकारी इमारतें और अन्य संसाधन जनता के पैसों से बनते हैं। उनका नुकसान पूरे समाज का नुकसान होता है।

यदि कुछ असामाजिक तत्व छात्रों की आड़ लेकर हिंसा करते हैं, तो उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और हिंसा करने वालों में स्पष्ट अंतर किया जाना भी आवश्यक है।

कौन बच निकले

जब हिंसा हुई और नुकसान हुआ तब आंदोलन में सक्रिय बताई जाने वाली कई चर्चित हस्तियां स्वयं किसी प्रत्यक्ष नुकसान का सामना करती नहीं दिखीं। कुणाल कामरा, अरुंधति रॉय, अरविंद केजरीवाल, विजेता दहिया, अभिजीत दीपके तथा सोशल मीडिया पर बयान देने वाले फिल्मी कलाकार जैसे ऋतिक रोशन, स्वरा भास्कर, और प्रकाश राज अपने घरों में सुरक्षित रहे, जबकि मैदान में मौजूद छात्रों और पुलिसकर्मियों को परिणाम भुगतने पड़े।

किसी भी आंदोलन में सबसे अधिक जोखिम आम लोगों और छात्रों को उठाना पड़ता है, जबकि सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों से टिप्पणी करने वाले लोग अक्सर उस प्रत्यक्ष जोखिम का हिस्सा नहीं होते।

सीख

हर छात्र और नागरिक के लिए सबसे बड़ी सीख यही है कि किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले तथ्यों की जांच अवश्य करनी चाहिए। केवल भावनाओं के आधार पर निर्णय लेना कई बार नुकसानदायक साबित हो सकता है।

साथ ही सरकारों को भी अहंकार छोड़कर समय रहते संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। जिससे कुणाल कामरा, अरुंधति रॉय, अरविंद केजरीवाल, विजेता दहिया, अभिजीत दीपके ऋतिक रोशन, स्वरा भास्कर, और प्रकाश राज जैसे लोग अपना निजी एजेंडा न चला पाएं। वहीं कोई भी राजनीतिक दल, संगठन या सार्वजनिक व्यक्ति छात्रों के आंदोलन का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए न कर सके।

 

 

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