ईरान का शांति से इन्कार और पश्चिम एशिया की तबाही को निमंत्रण...

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिष्टाचार और दया की उम्मीद करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बड़बोले ट्रंप न खुदा से डरते हैं, न विश्व जनमत से। नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुला मजाक उड़ा रहे हैं, विश्व संगठनों का अपमान कर रहे हैं। ऐसे कपटी और मूर्ख नेता से उलझने से किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा।
जब जीतने के कोई आसार नहीं तो प्रश्न यह है कि ईरान और उसके समर्थक देश आत्मघाती कदम उठाकर खाड़ी देशों और तमाम विकासशील राष्ट्रों की तबाही को न्योता क्यों दे रहे हैं? ऊर्जा संकट से भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था को घातक झटके लगेंगे, जबकि इस संघर्ष में पीड़ितों की कोई भूमिका है ही नहीं ।
2026 की तपती सियासत में, जब पूरा क्षेत्र बारूद के ढेर पर बैठा है, तेहरान की सरकार ने सुलह के दरवाजे बंद कर दिए हैं और टकराव जारी रखने की जिद जताई है। शांति की पेशकश आई भी, लेकिन जवाब मिला, खामोशी, तना हुआ लहजा और संघर्ष का इरादा। यह जिद अब सिर्फ राजनीति नहीं रही; यह सीधा आत्मघाती रास्ता बन चुकी है।
ईरान की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है। मुद्रास्फीति 40 प्रतिशत से ऊपर है, कुछ अनुमानों के अनुसार 42-48 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। रियाल की कीमत जमीन में गड़ चुकी है, एक डॉलर के लिए 10 लाख से 17 लाख रियाल तक। अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है, प्रतिबंधों की मार पड़ रही है और अंदरूनी असंतोष बढ़ रहा है। अगर फारस की खाड़ी में नौसैनिक नाकाबंदी लंबी खिंची, तो ईरान की सांस की नली दब जाएगी।
सच कड़वा है, लेकिन कहना जरूरी है। ईरान अपनी जरूरत का ज्यादातर सामान समुद्री रास्तों से मंगाता है। अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो फैक्टरियां ठप पड़ जाएंगी, दवाइयां गायब हो जाएंगी, बिजली व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी और जनता बेबस होकर सड़कों पर उतर आएगी। यह सब अचानक नहीं हुआ है। यह सालों की गलत नीतियों का हिसाब है।
ईरान ने अपनी विदेश नीति को जिद में बदल दिया। क्रांतिकारी नारे, परमाणु महत्वाकांक्षा, मिसाइलों का जुनून और प्रॉक्सी युद्ध का खेल। इन सबका नतीजा दुनिया से अलगाव, एकाकीपन और आर्थिक घुटन है। चीन के साथ दोस्ती को सहारा समझा गया, लेकिन यह बैसाखी साबित हुई। तेहरान ने सस्ता तेल बेचा; बदले में कुछ निवेश और थोड़ी राहत मिली, लेकिन भारी निर्भरता बढ़ गई। 80-90 प्रतिशत तेल एक ही खरीदार चीन को बेचना मजबूरी है, रणनीति नहीं। चीन ने अपने फायदे देखे, जबकि ईरान ने अपनी स्वतंत्रता गिरवी रख दी।
अब जब हालात बिगड़ रहे हैं, तो वही पुरानी जिद। सवाल उठता है कि ईरान ऐसा क्यों कर रहा है? क्या तेहरान को इराक का अंजाम याद नहीं? 1990 के दशक में नाकाबंदी ने इराक को तोड़ दिया था; भूख, बीमारी, बेरोजगारी और समाज का चरमरा जाना। क्या ईरान उसी रास्ते पर चलना चाहता है?
आज ईरान के प्रमुख क्षेत्र पहले ही कमजोर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र; साउथ पार्स, हमलों से क्षतिग्रस्त हो चुका है। तेल निर्यात खतरे में है। उद्योग आयात पर निर्भर हैं। अगर आपूर्ति रुकी, तो उत्पादन ठप पड़ जाएगा। कारखाने बंद, नौकरियां गायब, रियाल और गिरेगा, मुद्रास्फीति आग बन जाएगी और सड़कों पर गुस्सा फूट पड़ेगा।
यह सिर्फ आर्थिक कहानी नहीं है। यह क्षेत्रीय शांति-अमान की भी कहानी है। ईरान के प्रॉक्सी गुट हिजबुल्लाह, हूती विद्रोही और विभिन्न मिलिशिया, पहले ही दबाव में हैं। पैसा कम हुआ तो बौखलाहट बढ़ेगी। बौखलाहट बढ़ने पर गोलियां चलेंगी। खाड़ी में जहाजों पर खतरा मंडराएगा। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। जरा सी चिंगारी पूरी दुनिया में आग लगा सकती है।
तेहरान की नीति अब अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा। और जो दोस्त बचे हैं, वे भी अपने स्वार्थ के। हकीकत यह है कि ईरान के पास अभी भी मौका है। ट्रंप ने समय सीमा बढ़ाई है, लेकिन वक्त तेजी से फिसल रहा है।
जरूरत है जिद छोड़ने की, बातचीत की मेज पर लौटने की, परमाणु मुद्दे पर समझौता करने की, खाड़ी देशों से रिश्ते सुधारने की और सबसे महत्वपूर्ण; अपने लोगों के भविष्य के बारे में सोचने की। मुल्क सिर्फ मिसाइलों और नारों से नहीं चलता। मुल्क चलता है रोजगार से, बिजली से, दवाइयों से और उम्मीद से।
अगर सरकार अब भी आंखें मूंदे रखी, तो अंजाम साफ है; लंबी नाकाबंदी, गिरती अर्थव्यवस्था और अंदरूनी बगावत। इतिहास गवाह है कि जो देश समय पर नहीं झुकते, वे टूट जाते हैं।
ईरान के सामने दो रास्ते हैं। पहला: शांति, समझदारी और सुधार का रास्ता। दूसरा: टकराव, एकाकीपन और तबाही का रास्ता। चुनाव उनकी है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर। ऊर्जा कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होगा और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं झटके खाएंगी।
ईरान को समझना चाहिए कि जिद से कोई फायदा नहीं। परमाणु कार्यक्रम की जिद ने उसे अलग-थलग कर दिया है। प्रॉक्सी युद्ध ने संसाधनों को बर्बाद किया है। अब समय है कि तेहरान अपनी जनता की भलाई को प्राथमिकता दे। बातचीत से ही समाधान निकल सकता है; परमाणु संयम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय स्थिरता।
पश्चिम एशिया की स्थिरता न सिर्फ क्षेत्रीय देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है। भारत जैसे देश, जो खाड़ी से तेल आयात करते हैं, इस अस्थिरता का सबसे बड़ा शिकार हो सकते हैं। ईरान को आत्मघाती रास्ते से मुड़ना चाहिए, वरना इतिहास उसे एक और इराक के रूप में याद रखेगा; जिसकी जिद ने पूरे देश को तबाह कर दिया।
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