कॉकरोच जनता पार्टी क्या समझी - क्या समझे आप...


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दिल्ली का जंतर-मंतर। कुछ चेहरे, कुछ पोस्टर, कुछ नारे और बहुत सारे दावे। सोशल मीडिया पर माहौल ऐसा बनाया गया जैसे देश का युवा सैलाब बनकर सड़कों पर उतर आया हो लेकिन जब कैमरे हटे और शोर थोड़ा कम हुआ, तो कुछ सवाल पीछे छूट गए। वही सवाल, जिनका जवाब प्रदर्शन करने वालों को भी देना चाहिए।

कहानी की शुरुआत

भारत छोड़कर विदेशों में जा बैठे कुछ लोग भारत की कानून व्यवस्था, लोकतंत्र और संस्थाओं पर सवाल उठा रहे थे। सवाल उठाना गलत नहीं, लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि आप सरकार से सवाल पूछ सकते हैं, अदालतों पर चर्चा कर सकते हैं, नीतियों की आलोचना कर सकते हैं। यह आपका अधिकार है।

सवाल पूछने वाले खुद सवालों से बच नहीं सकते।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए कुछ कानूनी शर्तें होती हैं। जगह की सीमा होती है, समय की सीमा होती है और नियम होते हैं। अगर आप उन्हीं नियमों को मानने से इनकार करें और फिर मंच पर खड़े होकर कानून और संविधान की दुहाई दें, तो आम आदमी के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

Read in English: What did the Cockroach Janta Party understand? What did you understand?

एक दृश्य बार-बार दिखाई दिया। हाथ में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर क्योंकि बाबा साहेब सिर्फ एक तस्वीर नहीं, वे उस संविधान के निर्माताओं में से हैं जिसकी दुहाई दी जा रही थी। अगर संविधान पर भरोसा है, तो उसकी प्रक्रियाओं पर भी भरोसा होना चाहिए। अगर कानून का सम्मान है, तो उसके नियमों का भी सम्मान होना चाहिए। वरना आम आदमी पूछेगा कि यह आस्था है या सुविधा के हिसाब से चुना गया प्रतीक?

बात आई सरकार की

कुछ लोग खुले तौर पर चुनी हुई सरकार को हटाने की बातें कर रहे थे। लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, लेकिन वोट से, चुनाव से, दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई लोग वही थे जो पहले चुनाव हार चुके राजनीतिक पक्षों के लिए लिखते रहे, प्रचार करते रहे व समर्थन जुटाते रहे। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। हर नागरिक को राजनीतिक पसंद रखने का अधिकार है। लेकिन फिर इसे "जनता की आवाज़" कहकर पेश करना कितना सही है, यह सवाल बना रहता है।

आते हैं असली मुद्दे पर—NEET पेपर लीक।

यह लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा मामला है। गुस्सा होना बिल्कुल जायज़ है। जवाब मांगना भी जायज़ है। लेकिन क्या शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ही एकमात्र समाधान है?

क्या पेपर लीक के आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए? क्या जांच एजेंसियां काम नहीं कर रहीं? क्या अदालतों में मामले नहीं चल रहे? अगर अपराध हुआ है तो अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए, इसमें दो राय नहीं। लेकिन क्या व्यवस्था को पूरी तरह खारिज कर देना समाधान है या व्यवस्था को और बेहतर बनाने की मांग करना?

हालाँकि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें या न दें, लेकिन इस बार कैबिनेट फेरबदल में इन्हें मंत्री पद से हटाकर संगठन में भेजा जाना चाहिए। पेट्रोलियम मंत्री के रूप में भी प्रधान का कार्यकाल अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा और शिक्षा मंत्री के रूप में भी उनका प्रदर्शन विशेष प्रभावशाली नहीं माना जा सकता।

वहीं संगठन में काम करने की उनकी क्षमता पर कोई सवाल नहीं है।  चाहे ओडिशा हो या पश्चिम बंगाल, उन्होंने संगठन को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कितना युवा आया? कितनी देर डटा रहा?

भारत का युवा नाराज हो सकता है। सरकार के खिलाफ हो सकता है। और यह उसका अधिकार है, जिसके लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं। लेकिन एक बात बार-बार साबित हुई है, भारत का युवा सरकार और देश में फर्क समझता है।

सरकार से नाराजगी हो सकती है, देश से नहीं।

क्योंकि भारत का युवा जानता है कि, "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता, हमें उसे परफेक्ट बनाने के लिए काम करना पड़ता है।"

यही वजह है कि भारतीय युवा केवल ट्वीट नहीं करता, स्टार्टअप भी बनाता है। सिर्फ़ शिकायत नहीं करता, समाधान भी खोजता है। केवल आलोचना नहीं करता, योगदान भी देता है।

अगर लंबे आंदोलनों की बात करनी ही है, तो केवल तुलना के लिए किसान आंदोलन को याद कर लीजिए। सर्दी आई, गर्मी आई, बारिश आई, लेकिन किसान इन मौसमों में तो डटे रहे।

               

किसी भी आंदोलन की ताकत सिर्फ रील से नहीं, रियल ग्राउंड पर देखी जाती है।

और फिर वही पुराना नारा...

"आज़ादी..."

एक ऐसा नारा, जिसने पहले भी देश के सीने पर गहरे घाव छोड़े हैं। सवाल यह नहीं कि नारा लगाने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हर आंदोलन को उसी पुराने प्रतीक और उसी पुराने विवाद की जरूरत पड़ती है? क्या नए भारत के युवाओं के पास अपने विचार रखने के लिए नए शब्द नहीं हैं?

कई विदेशी रिपोर्टों ने, खासकर अल जज़ीरा ने, इस प्रदर्शन को प्रमुखता से दिखाया तो लेकिन उन्होंने यह सच नहीं बताया कि आंदोलन वास्तव में कितना मजबूत था, कितनी देर तक टिक पाया, और सबसे महत्वपूर्ण बात, भारत के युवाओं ने स्वयं CJP के दावों और मंशाओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

आखिरी सवाल।

क्या भविष्य में फिर कोई नया चेहरा, नया संगठन या नया एजेंडा लेकर भारत के युवाओं को भटकाने की कोशिश करेगा?

संभव है, लोकतंत्र में ऐसी कोशिशें होती रहेंगी, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि भारत का युवा क्या जवाब देगा?

शायद उसका जवाब बहुत सीधा होगा, हमें सुधार चाहिए, लेकिन अराजकता नहीं।

हमें जवाबदेही चाहिए, लेकिन व्यवस्था को जलाकर नहीं।

हमें बदलाव चाहिए, लेकिन भारत को कमजोर करके नहीं।

क्योंकि भारत का युवा विरोध करना भी जानता है और निर्माण करना भी।

और भारत का युवा जानता है कि, "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता, हमें उसे परफेक्ट बनाने के लिए काम करना पड़ता है।"

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